खुद से प्रेम करके सार्वभौमिक सत्य को आत्मसात और साकार करने वाला जीवन-ढंग
प्रकाशित अद्यतन
★खुद से सच्चा प्रेम करने के लिए
खुद से सच्चा प्रेम करना, दूसरों से प्रेम करने से भी अधिक महत्वपूर्ण मन की बात है।
तुम लोगों के संसार के अनेक धर्म और नैतिक शिक्षाएँ दूसरों का आदर करने और उन्हें महत्व देने की बात को अहमियत देकर सिखाती हैं, लेकिन खुद का सच्चा आदर करने और खुद को महत्व देने की मन की बात के बारे में बहुत कम कहा गया है, है न।
और अगर सिखाया भी गया हो, तो कई बार वह व्यक्तिगत स्व का बचाव करने तक ही सीमित रहता है।
सच्चा धार्मिक व्यक्ति या शिक्षक वह है जो मानवता के हर व्यक्ति को अपनी-अपनी जीवन-शक्ति बाहर लाने में मदद करे, ताकि वह अपनी इच्छा से जीवन स्थापित करे, और साथ ही ऐसे लोगों को संसार में भेजे जो पूरे समाज में योगदान दे सकें।
इस अर्थ में सच्चे धार्मिक व्यक्ति या शिक्षक से मिल पाना शायद अभी बहुत आम नहीं है।
इसलिए केवल दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय, खुद पर भरोसा करके, स्वेच्छा से सार्वभौमिक सत्य को आत्मसात करने वाली मन की बात महत्वपूर्ण हो जाती है, लेकिन मनुष्य मूल रूप से ऐसा जीव है जिसे दूसरों का आदर करने और उन्हें महत्व देने से पहले, खुद का आदर करने और खुद को महत्व देने की चेतना को प्राथमिकता से स्थापित करके आत्मसात करना ज़रूरी है।
क्योंकि जो खुद का सच्चा आदर नहीं करता और खुद को महत्व नहीं दे पाता, उसे आदर और महत्व पाने वाले की भावना समझ नहीं आती, इसलिए वह दूसरों का भी दिल की गहराई से आदर नहीं कर पाता और उन्हें महत्व नहीं दे पाता।
इस अर्थ में, यह भी कहा जा सकता है कि पृथ्वी-जगत में आगे मानवता के विकास की दिशा इस पर निर्भर करती है कि जीवन से जुड़ा सार्वभौमिक सत्य फैलता है या नहीं।

★सार्वभौमिक सत्य को आत्मसात करके साकार करने के लिए
सार्वभौमिक सत्य सीखने की इच्छा रखने वाले सब लोग एक समान सीख पाते हैं और अपने जीवन में उसे एक समान जीवंत करते हैं, ऐसा भी नहीं है, है न।
इसे यह फ़र्क भी कहा जा सकता है कि सीख के सामने सीधे खड़े होकर, सक्रियता से उसे आत्मसात करके उपयोग करते हो या नहीं।
जो मन के भीतर सीख (जीवन) की दराज़ खोलकर, किसी के कहे बिना आगे बढ़कर सीख लेता (अमल करता) है, वह जीवन में काम आने वाली जीवन की बुद्धि (सार्वभौमिक सत्य) को तेज़ी से आत्मसात करता है और रोज़ के जीवन में व्यावहारिक रूप से उपयोग करता है, है न।
इसके विपरीत, जो निष्क्रिय मन से सीखने की कोशिश करता है, वह रास्ते में अपने मनचाहे ढंग से सत्य का जीवन-ढंग न अपना पाने के कारण ढूँढ़कर दूसरों पर दोष डालना चाहता है, इसलिए सत्य और अपने आप को अलग करके खुद का बचाव करने में आसानी से लग जाता है।
जब तक मन ऐसा है, तब तक सार्वभौमिक सत्य आकाश के उस पार चमकता सूर्य ही रहता है, और कितना भी हाथ बढ़ाओ, वहाँ तक पहुँचता नहीं।
सार्वभौमिक सत्य मूल रूप से, यह कहना ज़रा भी अतिशयोक्ति नहीं कि वह मानवता की चेतना ही है, इतना वह मनुष्य के मन का मूल स्वभाव है, और यह भी कहा जा सकता है कि स्वयं जीवन का सार है, ऐसा ब्रह्मांड का सृजन-सिद्धांत है।
मनुष्य का मूल सच्चा स्वभाव स्वयं दिव्यता है, यह ज्ञान के रूप में तो समझ आता है, है न।
ऐसी उथली समझ के आधार पर भी सही, “सार्वभौमिक सत्य मन है, और दिव्य सिद्धांत भी है” (जापानी में सत्य, मन और दिव्य सिद्धांत, तीनों शब्द “शिनरी” बोले जाते हैं), इस सच्चे नियम को ज़रा-सी भी शंका के बिना स्वीकार करके, व्यक्तिगत स्व की चेतना को सार्वभौमिक सत्य की चेतना में घोलते जाओ, तो पता चले बिना जीवन की गहराई का जीवन-प्रकाश और अहं एक हो जाते हैं, और तुम अपने तन-मन में दिव्य सिद्धांत को प्रकट कर सकने लगते हो।
अपने मन में झाँककर देखो।
तुम्हें सार्वभौमिक सत्य से एक होने में जो रोक रहा है, वह बस “मैं भला दिव्य अस्तित्व कैसे हो सकता हूँ। मैं तो अपूर्ण ही हूँ” इस तरह खुद को तुच्छ मानने वाला, प्रेम से रिक्त विचार है, यह साफ़ दिखता है, है न।
सार्वभौमिक सत्य सीखना और उस पर अमल करना, स्वयं सच्चा प्रेम बन जाना है।
और यह भी कहा जा सकता है कि यह जीवन-प्रकाश को जानकर उससे एक हो जाना है।
ये बातें मन में उतर सकें, इसका तरीका है धीमी, सहज साँस को लगातार अमल में लाना।
गहरी साँस का निरंतर अभ्यास करते रहो, तो चेतना हमेशा दिव्यता के स्पंदन-क्षेत्र में बसी रहती है।
इसे करो या न करो।
यही भाग्य का दोराहा है।
वह दोराहा हर पल, हर पल तुम्हारी आँखों के सामने है।
उस दोराहे के सामने तुम क्या चुनते हो, क्या निर्णय लेते हो और क्या अमल में लाते हो।
उस समय, अगर तुम रोज़ से ही खुद से दिल से प्रेम करते हो, तो अपने और दूसरों को चोट पहुँचाने वाला निर्णय लिए बिना, सबको जीवंत करने वाला मार्ग चुनकर, सार्वभौमिक सत्य की ओर सीधे आगे बढ़ सकते हो।
तुम्हारे भविष्य में सुख हो।






