अपने ही सार्वभौमिक सत्य को जगाएँ (उत्तरार्ध)
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(पिछली बार से जारी)
★अपने ही सार्वभौमिक सत्य को जगाएँ
इसके लिए ज़रूरी है आज की बात के आरंभ में कहा गया “जीवन से जुड़ा दार्शनिक प्रश्न।”
जो उसका उत्तर अपने जीवन की गहराई से निकालकर याद कर सका, वह अपने कई विकल्पों में से खुद को जीवंत करने वाला मार्ग आसानी से खोज सकता है।
इसलिए दोहराता हूँ, मनुष्य के रूप में जन्म लेने के अर्थ और समूचे जीवन की स्थिति की खोज करना महत्वपूर्ण है।
यह “मैं इस दुनिया में क्यों जन्मा?” “जीने का क्या अर्थ है?” जैसे प्रश्न खुद से पूछकर दैनिक जीवन में बोध पाना कहा जा सकता है।
और अभी बताए महान मिशन के बारे में, अपने सार की खोज किए बिना उसे नहीं खोजा जा सकता, और लघु मिशन के बारे में भी, तुम मूल रूप से क्या थे यह याद किए बिना उसे नहीं खोजा जा सकता।
यहाँ तक समझाने पर, दुनिया के बहुत से वयस्कों के “जीवन के सत्य” या “जीवन के अर्थ” आदि का उत्तर न दे पाने का कारण स्पष्ट समझ में आता है न?
अब तक पृथ्वी के वयस्क, लगभग कहा जा सकने वाला बहुमत, बचपन से किशोरावस्था होकर वयस्क बनने की प्रक्रिया में, और वयस्क बनने के बाद भी, जीवन के मूल स्वभाव और जीवन के अर्थ के बारे में, मन में आया भी हो, वहाँ गहराई से स्थिर होकर चिंतन करने का अवसर न पाकर, रोज़ की व्यस्तता और सतही चेतना के विचारों में बहकर जीते आए।

इसलिए अब तक की दुनिया में युवा शुद्ध भाव से ऐसे प्रश्न वयस्कों के सामने रखें भी, तो स्पष्ट उत्तर दे सकने वाले कम थे।
लेकिन आगे की दुनिया अलग है।
पूरी पृथ्वी पर ज़बरदस्त गति से चेतना के विकास की ओर उन्मुख लोग बढ़ रहे हैं, इसलिए जीवन के सत्य और जीवन के अर्थ के बारे में अपनी-अपनी स्थिति से स्पष्ट उत्तर दे सकने वाले लोग बढ़ते जाएँगे।
और यहाँ महत्वपूर्ण बिंदु है, दूसरों का उत्तर हर हाल में केवल उन लोगों का सत्य है, इसलिए तुम्हारा अपना सत्य अंततः तुम्हें खुद खोजना होगा।
इसका अर्थ……, समझ रहे हो न?
हाँ, किसी के पहुँचे सार्वभौमिक सत्य को प्राइमिंग-जल बनाकर अपने ही सार्वभौमिक सत्य को जगाना है।
दूसरों के कहे सार्वभौमिक सत्य को देखने-सुनने में जो जानना चाहिए, वह यह है कि कहने वाले व्यक्ति के अनुसार उसकी गूँज तरह-तरह के कोणों और आयाम की गहराई से निकली होती है, इसलिए एक भी समान अभिव्यक्ति नहीं होती, न एक ही मनःस्थिति से निकले शब्द।
जब तक वह किसी की नकल या कॉपी-पेस्ट न हो।
पहले तुमसे कहा था न?
“साँचे से प्रवेश करके साँचे से बाहर निकलो”……
वही।
वही है।
अपना अनोखा सार्वभौमिक सत्य हाथ में पकड़ने के लिए भी, पृथ्वी पर आने के समय की आशा से जलते गर्म हृदय को याद करो।
पृथ्वी की मानवता के रूप में तुम, जीवन के प्रकाश को स्वतंत्र रूप से उपयोग में लाकर, सब कुछ के महान सामंजस्य वाला संसार पृथ्वी पर रचो।
इसी के लिए तुमने प्रतीक्षा कर रही कठिनाइयों से डरे बिना पृथ्वी-विकास दल में भाग लिया था। (समाप्त)






