सामग्री पर जाएँ

तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

जीवन के अपने घर लौट चलें-2

प्रकाशित अद्यतन

(पिछली बार से जारी)

जीवन के अपने घर लौटने के लिए मनोवृत्ति

पृथ्वी की धरती पर जी रहे लगभग सभी लोग “स्व” और “जीवन” को अलग करने वाली आत्म-चेतना से, “मैं अपनी शक्ति से जी रहा हूँ” ऐसा मानकर समय बिता रहे हैं, है न।

जीवन की ओर नज़र करके जीने वाले लोग भी, ईश्वर या बुद्ध जैसे दूर स्वर्गलोक के उस पार स्थित, हाथ न आने वाले अस्तित्व से आशा लगाकर, पूरी तरह उन पर निर्भर भाव से जीते हैं।

आज पृथ्वी पर, अपने जीवन में बसी अनंत बुद्धि और सृजन-शक्ति को बाहर लाकर जीने का प्रयास करने वाले लोग दस हज़ार भी नहीं हैं।

सच कहूँ तो, “अपनी शक्ति से जी रहा हूँ” ऐसा मानने के कारण ही कष्ट ख़त्म नहीं होते, और ईश्वर या बुद्ध पर निर्भर रहने वाले भाव (पर-शक्ति पर आस) से जीने के कारण ही, जीवन की शक्ति सक्रिय रूप से प्रकट नहीं हो पाती, लेकिन बहुत सी पृथ्वी की मानवता को इसका पता नहीं है।

जीवन के अपने घर लौट चुकी अवस्था का अर्थ है, वह अवस्था जिसमें मनुष्य अपने मूल स्वरूप को याद करके, किसी पर भी निर्भर हुए बिना अपने जीवन की शक्ति को बाहर लाकर, दृढ़ तर्क और बुद्धि प्रकट करते हुए जीता है।

उसकी आधार बनने वाली मनोवृत्ति को अडिग हृदय कहते हैं।

अडिग हृदय, धार्मिक भाषा में ज्ञान-प्राप्ति की अवस्था है, यानी किसी भी बात, किसी भी चीज़ में न अटकने, न बँधने वाली मनःस्थिति।

वह, पक्की धारणाओं, आग्रहों, पूर्व-निर्णयों और मोह जैसे अमुक्त विचारों को असीम रूप से हल्का करते जाने के आगे वाली मनःस्थिति है।

शब्दों का किण्वन करके प्रकाश बिखेरें

हिल भी न पाने जैसे दिखने वाले संसार में, कष्ट में पड़े लोगों, घायल होते प्राकृतिक वातावरण, सताए जा रहे सारे जीवों आदि के लिए प्रेम की प्रार्थना अर्पित करना भी पवित्र काम है, लेकिन केवल उतने से उस अवस्था तक नहीं पहुँचा जा सकता।

“तो फिर आख़िर करें क्या?” पूछते हो?

हाँ, क्रम से बताता हूँ, शांत रहो।

बताना आसान है। तुम्हारा उसे सुनना (इनपुट करना) भी आसान है।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है, इनपुट की गई बात को एक बार अपने मन की तह में उतारकर, पूरी तरह उसका किण्वन होने देना (ताकि वह प्रकाश बिखेरे; जापानी में “किण्वन” और “प्रकाश बिखेरना” दोनों “हक्को” बोले जाते हैं), और अपनी चेतना के रूप में फिर से आउटपुट करके, वचन और कर्म में प्रकट करना।

यह क्रम पूरा किए बिना, कितनी भी अच्छी बातें भर लो, वह बेकार ज्ञान का ढेर बन जाता है।

सत्य की बात, चाहे किताब पढ़कर मिली प्रेरणा हो या किसी से सुनी अच्छी बात, जब तक उसे पूरी तरह अपना बनाकर, अपने वचन और कर्म में प्रकट न कर सको, तब तक वह असली नहीं बनती।

किसी से सुनी बात को ज्यों-का-त्यों कह देने पर, कहीं न कहीं शब्द तैरते-से सुनाई देते हैं, है न।

अपने को असली बनाकर पालने की तरकीब है, पढ़े या सुने सत्य के स्पंदन को एक बार मन की तह में उतारकर उसका किण्वन होने देना (प्रकाश बिखेरने देना)।

“सत्य के स्पंदन वाले शब्दों” का मन की गहराई में किण्वन हो, तो वे प्रकाश बिखेरते हैं।

बिखरा हुआ वह प्रकाश मन की गहराई से रिसकर बाहर आने लगता है, और आगे चलकर बिना रुके उमड़ने लगता है, ज़रूर।

तब तो बस बात बन गई।

उस चरण पर पहुँचने पर, अपने पर कुछ भी थोपने की ज़रूरत नहीं रहती, इसलिए सत्य के अनुरूप विचार, वचन और कर्म तुम्हारे लिए सामान्य बात बन जाते हैं, तुम स्वाभाविक रूप से दिव्यता के विचार छोड़ते हो, सहज ढंग से सत्य को धारण किए शब्द बोलते हो, और “जैसा दिखता है” से आगे बढ़कर “जैसा वास्तव में है” वाले कर्म कर पाते हो।

(अगली बार जारी)

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

वीडियो जल्द आ रहे हैं

वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

星々の仲間入りを果すために

YouTube चैनल पर जाएँ