चेतना के आयाम के बारे में (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★आयाम क्या है
आयाम की गहराई से जुड़ी बात करना कठिन है।
क्योंकि पिछली बार “चेतना का कोण और आयाम” के बारे में बात करते समय जब मैंने कहा, “चेतना के आयाम को दिव्य क्षेत्र में रखकर, चेतना का कोण दिव्य क्षेत्र की ओर करके प्रकट करो तो अच्छा है”, तो यह प्रश्न आया, “अभी की चेतना दिव्य क्षेत्र में है ही नहीं, तो चेतना के आयाम को दिव्य क्षेत्र में कैसे रखें?”
इसलिए आज ऐसी बात करूँगा जिससे “आयाम की गहराई की समझ” गहरी हो।
तो, सबसे पहले, “आयाम क्या है?”, यही बात।
सीधे और संक्षेप में उत्तर दूँ तो, “हर एक स्थान के फैलाव को दर्शाने वाला एक सूचक”।
और उस आयाम के अंतर और गहराई को सरल शब्दों में कहें, तो इसे “दूसरे आयाम का काल-स्थान” भी कहा जा सकता है, और “मन की गहराई में फैला अनंत ब्रह्मांडीय काल-स्थान” भी।
जिन्हें केवल इन शब्दों से समझ न आए, वे इसे भौतिक विज्ञान के ढंग से समझें।
क्या? और भी समझ नहीं आया?
“देखने और सुनने की सीमा से बाहर के स्पंदन-क्षेत्र में स्थित काल-स्थान”, ऐसा कहूँ, तो थोड़ा-बहुत तो समझ आ जाएगा, है न।
उदाहरण के लिए दृश्य क्षेत्र……, पृथ्वी की मानवता की खुली आँखों के लिए दृश्य प्रकाश की तरंग-लंबाई की सीमा (आँखों को दिखने वाला स्पंदन-क्षेत्र) लगभग 360nm (नैनोमीटर) से लगभग 830nm (व्यक्ति-व्यक्ति में अंतर) तक है, यह पहले भी बताया था न। (Voice of brothers 27 चेतना के विकास तक पहुँचने का मार्ग और मन का मानचित्र)
और श्रव्य क्षेत्र के बारे में आम तौर पर कहा जाता है कि वह लगभग 20Hz से लगभग 20,000Hz (व्यक्ति-व्यक्ति में अंतर) तक है।
उस सीमा के बाहर वाले दृश्य और श्रव्य क्षेत्रों में ऐसे बहुत से संसार फैले हुए हैं जिन्हें तुम लोगों की आँखें और कान पकड़ नहीं सकते।

★आयामों की संरचना
भौतिक मनुष्य मृत्यु के बाद जिस संसार में जाते हैं, वह भी देखने-सुनने की इस सीमा से बाहर के संसार में है।
और देखने-सुनने की सीमा से बाहर का संसार भौतिक जगत के अलावा बस एक ही नहीं, बल्कि अनेक-अनेक, अनगिनत हैं।
और उनमें से हर एक संसार की अपनी देखने-सुनने की सीमा है, और वहाँ अपना-अपना आकाश और धरती (आयामी स्थान) फैला हुआ है।
और हाथ से छूने, नाक से सूँघने और मुँह से चखने लायक पदार्थ और सुगंध भी, उन हर एक आकाश-धरती में मौजूद हैं।
उन दूसरे आयामों के काल-स्थानों को कभी स्वर्ग या नरक जैसे शब्दों से व्यक्त किया जाता है, है न।
और उन संसारों की कल्पना करते समय, स्वर्ग को ऊपर और नरक को नीचे, इस तरह स्थान के अंतर से व्यक्त किया जाता है, लेकिन वे संसार ज़रूरी नहीं कि ऊपर-नीचे बँटकर मौजूद हों, बल्कि तुम लोग अभी जिस स्थान में जी रहे हो, उसी पर परत-दर-परत मौजूद हैं। (यानी वे चेतना की गहराई में फैले, एक साथ मौजूद दूसरे संसार हैं)
अगर विकसित ग्रहों के संसार (आत्मा के मूल घर) को स्वर्ग कहा जाए, तो यह कहना ग़लत नहीं कि वह आकाश के ऊपर है, लेकिन पृथ्वी-जगत के संबंध में स्वर्ग, यह संसार और नरक, ऐसा विभाजन करें, तो वे संसार ऊपर-नीचे बँटकर मौजूद नहीं, बल्कि एक-दूसरे पर परत की तरह वास्तव में मौजूद हैं, ऐसा कहा जा सकता है।
तुम लोगों को आसानी से समझ आए, इसलिए अभिव्यक्ति के रूप में हर संसार की जगह ऊपर-नीचे के स्थान-संबंध से दिखाई जाती है, पर सच में अभी यहीं की चेतना की गहराई में सब कुछ देखा जा सकता है।
और अभी जो मैंने इशारे भरे ढंग से कहा, “यह कहना ग़लत नहीं कि वह आकाश के ऊपर है”, वह इसलिए कि ग्रहों के संसार भी, अंततः कहें तो, तुम लोगों के, नहीं, हम सबके मन की गहराई में फैले संसार हैं।
और तुम लोग अभी जहाँ हो, वहीं चेतना से निकलने वाली आवृत्ति को देखने-सुनने की सीमा के बाहर बदल दो, तो बोध पा चुके लोगों के रहने वाले देवलोक में भी जा सकते हो, और अमुक्त आत्माओं के अड्डे यानी सूक्ष्म लोक में भी।
चेतना के विकास की यात्रा अभी-अभी शुरू हुई हो, तब तक यह कठिन है, लेकिन अभी की तरह चेतना का विकास करते चलो, तो तुम लोगों का तन-मन दोनों से आयामों के पार सक्रिय होने का समय आना बस समय की बात है। (अगली बार जारी)






