पृथ्वी की शांति और आत्मिक स्तर का उत्थान (2/7)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
लोगों की संख्या जितने सत्यों के पीछे स्थित सार्वभौमिक सत्य को पकड़ने के लिए
ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ, तिरछे जैसी स्थिति-निर्धारण, चीज़ों को भौतिक रूप से देखने पर, एक-दूसरे के लिए साझा धारणा बनाने में आसान सुविधाजनक अभिव्यक्ति तो है, लेकिन ये ज़रूरी नहीं कि तथ्य को प्रकट करने वाले शब्द हों।
क्योंकि वहाँ आयाम की गहराई नाम का महत्वपूर्ण टुकड़ा गायब है।
खैर, अभी “तथ्य” शब्द का उपयोग किया, और आज अच्छा अवसर है, इसलिए “तथ्य” के सच्चे अर्थ को भी परिभाषित कर लेते हैं।
याद रखना अच्छा है कि सतही तथ्य भी, सत्य भी, सार्वभौमिक सत्य भी, लोगों की संख्या जितने होते हैं।
इसका अर्थ क्या है, तो हर व्यक्ति जो सोचता और विश्वास (धारणा) करता है, वही उस व्यक्ति के लिए एकमात्र तथ्य, सत्य और सार्वभौमिक सत्य बन जाता है।
यह उस बुनियादी धारणा को भी बनाता है जिससे सब एक-दूसरे के अंतर को स्वीकार करके, पृथ्वी की समस्त मानवता हाथ में हाथ लेकर भविष्य बनाती है।
ऐसा क्यों कहता हूँ, क्योंकि अंतर पर हमेशा आपस में उलझते रहो तो पृथ्वी शांत नहीं होती, और अंतर होते हुए भी ज़बरदस्ती एक समान मानने की कोशिश में अपने मूल्य एक-दूसरे पर थोपो तो वहाँ भी खिंचाव पैदा होता है न?
उससे पहले, अगर सब मूल्यों (सतही धारणा) के अंतर पर हार मान बैठें या देखकर अनदेखा करने वाले ही हों, तो कितना भी समय बीत जाए धरती शांत नहीं होगी न?
इसलिए, पृथ्वी को सामंजस्य वाला तारा बनाने के पहले कदम के रूप में, सबसे पहले एक-दूसरे के अंतर का सम्मान करने से शुरू करना ज़रूरी है।

इसे आसान उदाहरण से समझाऊँ तो, जापान के प्रतिनिधि चावल कहलाने वाले कोशिहिकारी को “स्वादिष्ट” मानने वाले लोग, थाई चावल जैसे कम चिपचिपे चावल में कमी महसूस करते हैं और सच कहें तो उसे “स्वादिष्ट” नहीं मानते न?
लेकिन इसके उलट, थाई चावल जैसे सूखे-सूखे चावल को पसंद करने और खाने के आदी लोगों के लिए, कोशिहिकारी जैसे चिपचिपे चावल की वह कोमलता और चिपचिपाहट मुँह को नहीं भाती, और खुलकर कहें तो इस पक्ष के लोग भी सच में दूसरे स्वाद के चावल को “स्वादिष्ट” नहीं मानते।
इस तरह जिन चीज़ों में रुचि बँटती है, उनका मूल्यांकन व्यक्ति, स्थान, जीवन की आदतें आदि बदलने पर बिल्कुल अलग हो जाता है न?
इसका अर्थ है कि कौन-सा चावल स्वादिष्ट लगता है, यह व्यक्ति और क्षेत्र के अनुसार अलग है, और यह दिखाता है कि वस्तुनिष्ठ रूप से कौन-सा चावल ऊपर और कौन-सा नीचे, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
अगर मूल्यांकन करना ही हो, तो उन्हें एक सीधी क्षैतिज रेखा में बाएँ-दाएँ रखकर, “ऐसी किस्मों और स्वादों के अंतर साथ-साथ मौजूद हैं” देखकर, श्रेष्ठ-निम्न का ठप्पा न लगाने वाली दृष्टि ही न्यायसंगत दृष्टि कही जा सकती है। (अगली बार जारी)






