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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

चेतना के विकास को बढ़ावा देने के लिए

प्रकाशित अद्यतन

★बिना समझौते का असली सार्वभौमिक सत्य

तुम लोग दिव्यता के काफ़ी हद तक फिर से जाग चुकी अवस्था के निकट आ गए हो, इसलिए आज बिना समझौते वाले असली सार्वभौमिक सत्य का एक हिस्सा बताता हूँ।

दुख मत करो

मनुष्य हो, इसीलिए दुख में ही ठहरे रहने की ज़रूरत नहीं।

उसकी जगह, अपने और दूसरों के विकास का मार्ग सही-सही परखकर, मन को स्पष्ट करो।

दुख भी, जीवन के महासागर से देखो तो कुछ समय में गुज़र जाने वाली क्षणिक लहर है, यह जान लो, तो चाहे कुछ भी देखो-सुनो, चाहे कैसी भी स्थिति से गुज़रो, जीवन का प्रकाश न पहुँचने वाले अँधेरे कमरे में निराश होना बंद हो जाता है।

सार यह है कि विचारों को जीवन के महासागर में घोलकर फैला दो, और व्यक्तिगत स्व की चेतना को बिखराकर मिटा दो।

इसके लिए, पृथ्वी-संसार की शांति की हमेशा प्रार्थना करते रहना अच्छा है।

द्वेष मत रखो

और महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य हो, इसीलिए द्वेष नहीं रखना चाहिए।

कहने की ज़रूरत नहीं, पर वह जीवन की मूल चेतना नहीं है।

द्वेष मन की वह फफूँद है जो तब पैदा होती है जब अपनी बात न चलने पर लगता है कि धोखा हुआ या अनादर हुआ।

इससे मिलती-जुलती एक भावना है कुढ़न, पर वह भी उसी प्रकार की है।

ऐसी चीज़ों में घुलकर जीवन के सार, यानी दिव्यता को न खो बैठो, ऐसे जीना चाहिए।

क्रोध मत करो

और फिर, मनुष्य हो, इसीलिए क्रोध नहीं करना चाहिए, ऐसा कहा जा सकता है।

उस क्रोध के उठने के मूल को अच्छी तरह देखो।

तब यह तथ्य साफ़ दिखेगा कि अपनी छोटी-सी पक्की धारणाओं में न समाने वाली चीज़ पर तुम मनमाने ढंग से भुनभुना रहे थे।

क्रोध जब क्वथनांक पर पहुँचता है, तो घृणा में बदलकर मन की शांति छीन लेता है।

तब एक ही विचार में जकड़कर उससे निकलना कठिन हो जाता है।

अभी ऐसी पीड़ा लिए लोग भी कम नहीं, लेकिन वह भी पृथ्वी की मानवता के विकसित होने तक का एक दौर है, इसलिए उसे प्रेम के मन से घेरकर, प्रार्थना में शुद्ध करो, यही चाहता हूँ।

डाँटना ठीक है

ऐसे क्रोध से मिलता-जुलता दिखते हुए भी अलग है, मन की वह गति जिसे डाँटना कहते हैं।

कहा जाता है न कि क्रोध करना ठीक नहीं, पर डाँटना ठीक है।

ऐसा इसलिए कि जापानी में डाँटना “शिकारु” और चमकना “हिकारु” है, डाँटना अपने और दूसरों पर जीवन का प्रकाश प्रबलता से बिखेरने का कर्म है।

इसकी परख आत्मिक विवेक (सानिवा) कर सकने वाली मनोदशा के बिना नहीं होती, लेकिन रोज़ की साँस को धीमा और सहज रखकर जियो, तो दिल को तेज़ी से धड़काए बिना प्रकाश बिखेरना कोई भी कर सकता है, इसलिए इसी भाव से आत्म-साधना में लगो।

लेकिन ध्यान रहे, जो दूसरों को डाँटता है, उसे रोज़ से ही खुद को कठोरता से अनुशासित रखकर, निस्संदेह सार्वभौमिक सत्य को जीना चाहिए।

क्योंकि जो खुद को अनुशासित करके दिव्यता प्रकट नहीं करता, वह ऐसा करने चले, तो सामने वाले के ही स्तर पर खड़े रहकर डाँटेगा, और वह प्रकाश नहीं बनेगा।

अलगाव मत करो

और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य हो, इसीलिए अपने और दूसरों को अलग करके नहीं देखना चाहिए।

दूसरे क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं और कैसे करते हैं, यह हर एक की स्वतंत्र इच्छा पर छोड़ा गया है, लेकिन उसे देखकर तुम क्या सोचते हो, इसकी ज़िम्मेदारी तुम्हारी अपनी है।

महत्वपूर्ण यह है कि तुमने सामने वाले के बारे में क्या महसूस किया।

उसे अपनी ओर मोड़कर, अपने भीतर जो है उसे देखने का प्रयास करो।

चेतना के विकास को बढ़ावा देने का रहस्य

जैसा हमेशा कहता हूँ, जिसका कारण तुममें न हो, उसे तुम महसूस ही नहीं कर सकते।

तन-मन के बाहर कुछ महसूस करना, अपने भीतर जो है उसे प्रक्षेपित करके देखना है, इसलिए जो नहीं है उसका प्रक्षेपण हो ही नहीं सकता।

उलटे, प्रक्षेपण हुआ, इसका अर्थ है कि तुम्हारे भीतर ऐसा सोचने का कारण छिपा था।

इस तथ्य को स्पष्ट रूप से जानकर, “संसार के प्रति जो महसूस होता है, वह भीतर के ब्रह्मांड को देखना है” यह दृढ़ता से सोचने का अभ्यास करना ही चेतना के विकास को बढ़ावा देने का रहस्य है।

आज की बातें ऐसी हैं कि मन बनाकर स्पंदन-समायोजन करो, तो ज़रूर सार्वभौमिक सत्य के अनुरूप दिशा में ले जा सकते हो, इसलिए आदत बन चुके विचारों को पार करके जिऊँगा, यह मन में दृढ़ संकल्प लेकर अमल करके देखो।

ऐसा करो, तो तुम्हारे जीवन का प्रकाश देखते-देखते बढ़ने लगेगा, और तुम बहुत दूर नहीं ऐसे भविष्य में, केवल प्रकाश वाली चेतना में जीने वाले व्यक्ति बनोगे।

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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