नया संसार बनाने वाला माइंडसेट-2
प्रकाशित अद्यतन
मनुष्य को मिली स्वतंत्र इच्छा का सच्चा अर्थ
तो पृथ्वी की मानवता को जीवन के सार, यानी दिव्यता को याद करने के लिए कैसा बदलाव ज़रूरी है?
मानवता को कैसे बदलना चाहिए?
हममें से हर एक को क्या और कैसे करना चाहिए?
“मैं अकेला बदलने का प्रयास न भी करूँ, तो कोई और बदल जाएगा और स्थिति सुधर जाएगी”
अगर कोई ऐसा सोचता हो, तो कृपया एक कदम आगे बढ़कर, अपने किए जा सकने वाले कामों की ओर भी नज़र डालिए।
क्योंकि अगर एक भी व्यक्ति पुराने ढर्रे वाला जीवन-ढंग न छोड़े, तो पृथ्वी पूर्ण सामंजस्य की अवस्था में नहीं आती।
लेकिन मानवता के हर व्यक्ति को जीवन के माता-पिता से स्वतंत्र इच्छा मिली है।
फिर भी उसके आधार पर “मैं कैसे भी जिऊँ, मेरी मर्ज़ी” या “मैं अपने रास्ते चलूँगा। दूसरों से क्या लेना-देना” सोचना, थोड़ी बर्बादी है।
क्योंकि मनुष्य को मिली स्वतंत्र इच्छा उस ग्रह के आकाश-धरती में, केवल एक विशेष स्पंदन-क्षेत्र की सीमा के भीतर ही मान्य है।
जैसा अभी कहा, पृथ्वी-जगत को घेरे स्पंदन पूरी तरह सूक्ष्म गूँज वाले संसार में बदलता जा रहा है।
उस बदलाव को न रोका जा सकता है, न पीछे धकेला जा सकता है।
क्यों, तो इसलिए कि पृथ्वी से जुड़े सब पदार्थ और मन के मूल स्पंदन का आत्मिक होते जाना, और आख़िरकार दिव्य-आत्मिक स्पंदन के संसार में पहुँचना, ब्रह्मांड को रचने और चलाने वाली महान शक्ति द्वारा दिशा दिया गया नियम है।
पृथ्वी के लिए भी वयस्कों में शामिल होने का समय आ गया है।
यह ग्रह अभी युवावस्था में एक पैर रख चुका है।

अब ही ग्रह के स्पंदन के बदलाव के अनुसार जीवन-ढंग का विकास करें
यह ठीक वैसा ही है जैसे नवजात शिशु समय के साथ किशोरावस्था में पहुँचता है, और आख़िरकार अनिवार्य रूप से वयस्क बनता है।
ग्रह भी ऐसे ही हैं।
ग्रहों में ऐसा जीवन होता है जो उस ग्रह को अपना शरीर बनाकर जीता है।
ग्रह जीवित प्राणी है।
मानवता भी और सब जीव भी, उसी पृथ्वी-जीव की त्वचा पर जी रहे हैं।
नहीं, सही कहें तो, जीने दिए जा रहे हैं।
पृथ्वी का किशोरावस्था से युवावस्था में प्रवेश करने का समय ठीक यही युग है।
आज जीने वाली सारी मानवता को तुरंत जो सोचना चाहिए, वह यह है कि इस बदलाव के दौर में पृथ्वी से जुड़े सब मानसिक और भौतिक स्पंदन कैसे बदलते हैं, और उसके साथ हम मनुष्यों को अपना जीवन-ढंग कैसे बदलना चाहिए।
वह, जैसा मैं अभी से कहता आ रहा हूँ, जीवन के सार, यानी दिव्यता को याद करना है।
उसी चेतना से सब कुछ में दिव्यता को स्वीकार करना है।
इसके लिए, सबसे पहले, अपनी दिव्यता को स्वाभाविक बात के रूप में पहचानना ज़रूरी है।
(अगली बार जारी)





