अंतिम और सबसे बड़े विकास की सही घड़ी
प्रकाशित अद्यतन
इस वर्ष 2025, संसार की मानवता के लिए, अपने जीवन के सार यानी पवित्रता (सामंजस्य की ओर उन्मुख स्वभाव) को याद करके, विचारों, शब्दों और कर्मों में प्रकट करते जाने से भविष्य खुलने तक पहुँचने के सत्य का बोध करने का पहला वर्ष बनेगा।
और, जो लोग पहले से इसकी ओर उन्मुख होकर जीते आए हैं, वे अपनी प्रार्थना, IN, आत्म-विकास आदि की उपलब्धियों से, और भी अनसोचा उज्ज्वल भाग्य पाएँगे।
वह, न चमत्कार है, न ब्रह्मांड या देवताओं की कृपा, बल्कि अपने विचार, वचन और व्यवहार से, स्वयं खोला गया भविष्य है।
पूरी मानवता बोध करेगी
कि अपने जीवन का सार पवित्रता है
किसी पर आश्रित होकर नहीं
किसी पद्धति पर निर्भर होकर भी नहीं
कोई कर देगा यह सोचकर तमाशबीन बनकर भी नहीं
अपने भीतर निहित पवित्रता को बाहर लाकर
विचारों, शब्दों और कर्मों में प्रकट करके
पहले स्वयं को बदलना
और स्वयं के पहचाने संसार को बदलते जाना ही
बड़े परिवर्तन-काल में स्थित इस तारे को फिर से जीवित करने का
एकमात्र मार्ग है
और कि मानवता का जीवन
सूर्य की तरह जीवन को पालने वाला
सामंजस्य लाने वाला महान प्रकाश है
इसी वर्ष, 2025 में
पृथ्वी की मानवता इस सत्य का बोध करेगी
कुछ आत्माएँ ऐसी भी हो सकती हैं जो पृथ्वी के विकास की ऐसी धारा पर सवार होने से इनकार करें।
लेकिन, इसे समस्या मानने की ज़रूरत नहीं।
इसके कारण “वह व्यक्ति बेचारा है” या “मैं चुना हुआ इंसान हूँ” कहकर, स्वयं और दूसरों की तुलना करके, सुख-दुख-क्रोध-हर्ष के कीचड़ भरे पानी को हिलाने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं।
क्योंकि वह उस व्यक्ति और उसके संरक्षक देवताओं और आत्माओं का तय किया आत्मा के विकास का रास्ता (प्रक्रिया) है।
सारे दृश्यों के बदलाव को, तेज़ गति से चलते समय दिखने वाले दृश्यों की तरह, बस देख लेना काफ़ी है।
सिर के ऊपर बहकर आते, और अंततः चले जाते बादलों की गति को देखने की तरह, बस निहारते रहना काफ़ी है।

पृथ्वी पर पवित्रता में लौट न भी सके
आत्मा का विकास बीस-तीस हज़ार साल देर से भी हो
जीवन की अंतरतम गहराई के मूल की आँख से देखें तो
ऐसी बातों में कोई बड़ा अंतर नहीं
पृथ्वी के लोगों को समझ आने वाले ढंग से कहें तो
“एक ही ट्रेन के आगे वाले डिब्बे में सवार हो
या पीछे वाले डिब्बे में, बस इतना अंतर है”
कुछ भी चिंता न करो तब भी
हर कोई जीवन के विकास की धारा पर सवार है
उसे नकारो तब भी
मानवता के पास विकास के सिवा जीने का कोई रास्ता नहीं
रास्ते में रुकते-घूमते बढ़ने वाले भी
सीधे जीवन के महामार्ग पर चलने वाले भी
सब
ब्रह्मांड के मूल स्रोत से जन्मी जीवन-किरणों का हिस्सा हैं
हम, अब पृथ्वी जिसका अनुभव करने वाली है, उस अंतिम और सबसे बड़े विकास की सही घड़ी को अपनी आँखों से देखेंगे।
क्योंकि हम, उसी के लिए दूसरे तारों से पृथ्वी पर आए ब्रह्मांडीय दिव्य-आत्मा हैं।
अब तक समय नहीं आया था, और हमने उस तथ्य को स्मृति की गहराई में बस रख छोड़ा था।
लेकिन, ऐसा पालने वाला युग अब समाप्त है।
पृथ्वी के लोगों के, अपने मन के पैरों पर खड़े होकर, आत्मा की आत्मनिर्भरता वाला जीवन जीने का समय आ गया है।
प्रकृति और सभी जीवों को परेशान करके, केवल हम मनुष्यों की सुविधा से काम चलाने वाला युग समाप्त है।
सब कुछ के सामंजस्य को सिद्धांत बनाकर, बस उसी के लिए अपने जीवन को काम में लगाएँ।
पृथ्वी ने अभी, आत्म-केंद्रित मूल्य-बोध के न चलने वाले युग का प्रवेश-द्वार पार कर लिया है।
समग्र को जीवित करने के लिए, अपने जीवन का उपयोग करते जाना।
यही, ब्रह्मांडीय समाज में मान्य मूल्य-बोध है, और जीवन के मूल स्रोत के साथ एक होते जाने का मार्ग है।
अंतिम और सबसे बड़े विकास की सही घड़ी में
तुम कैसी जीवन-शैली चुनोगे?
कैसी भी जीवन-शैली चुनो
उसका परिणाम पाने वाले
तुम लोग, पृथ्वी के लोग हो
हम
बस साथ देते हैं
भले ही
अब पृथ्वी पर कुछ भी हो
तुम लोगों का भविष्य उज्ज्वल है
बस इतना
अभी बता देते हैं





