जीवित रखे जाकर जीना-3
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
पिछली बार, मैंने लिखा था कि हर मनुष्य के भीतर, सब कुछ को सामंजस्य में लाने वाली शक्ति बसी है, और उसका कुशलता से उपयोग करने की बुनियादी पहचान ही “जीवित रखे जाकर जीने का बोध करना” है।
लेकिन केवल उस व्याख्या से, मनुष्य की वास्तविकता का एक हिस्सा ही व्यक्त हो पाता है, इसलिए यहाँ कुछ और जोड़ता हूँ।
मैं हमेशा, आसपास के लोगों से ऐसा कहता हूँ।
“रोज़ कम से कम एक बार, ‘मैं कौन हूँ? (Who am I?)’ यह स्वयं से पूछिए।”
ऐसा क्यों कहता हूँ, तो इसलिए कि अपने जीवन के सार के बारे में, दूसरों से कितना भी व्याख्यान सुन लें, जब तक दूसरे के अनुभव को दूसरे के शब्दों के रूप में पहचानते रहते हैं, तब तक सच्ची वास्तविकता नहीं पकड़ सकते।
यह किसी के लिए भी है।
अपना सत्य, केवल आत्म-निरीक्षण से ही जाना जा सकता है। (इसे यह भी कह सकते हैं कि केवल अपने अनुभव के ज़रिए)
और, केवल इतने से बात अधूरी रहेगी, इसलिए दूसरे के अनुभव को अपने अनुभव तक ऊपर उठाने का तरीका भी बताता हूँ।
वह है, दूसरे के कहे शब्दों या लिखे लेख को, अपने शब्दों के रूप में बोलना या बार-बार उतारकर लिखना।
और इसके बाद की बात महत्वपूर्ण है, उस बात को एक बार भूल जाइए।
भूल जाना क्यों अच्छा है, तो मन के भीतर किण्वन का समय देने के लिए।
एक सप्ताह, आधा महीना, एक महीना, या आधा साल, एक साल, अवधि विषय के अनुसार अलग है, लेकिन किण्वित हुए शब्द (दूसरे का अनुभव) अगर अपने जीवन को जीवित रखने के लिए ज़रूरी हों, तो वे निश्चित रूप से अपनी कौंध के रूप में, अपने शब्दों में प्रकाशित होने (जापानी में “किण्वन” और “प्रकाशित होना” दोनों “हक्को” बोले जाते हैं) का समय आता है।
कभी वे शब्दों के रूप में ही कौंधते हैं, और कभी अपने अनुभव के साथ बोध के रूप में महसूस होते हैं।

उस तथ्य को मन में रखकर, आगे की बात पढ़िए।
मनुष्य मूल रूप से, ब्रह्मांड को रचने वाली मूल चेतना को जीवन की अंतरतम गहराई में रखने वाला जीव है।
इस पृथ्वी पर 30 लाख से 1 अरब 11 करोड़ प्रजातियों तक के जीव बताए जाते हैं, लेकिन ब्रह्मांड को रचने और चलाने वाले जीवन के स्रोत से सीधे जुड़ा ज्ञान और सृजन-शक्ति रखने वाला जीव केवल मानवता है।
यह जानते हुए या न जानते हुए, पुराने लोगों ने मानवता को “सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ” कहा, लेकिन वास्तव में मानवता सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ है।
लेकिन अब तक मानवता की जीवन-शैली और ढंग ने, उस मूल रूप को अभी पूरी तरह प्रकट नहीं किया था।
लेकिन उसका सार, अपने ग्रह पर ब्रह्मांड के रचयिता के आदर्श यानी महान सामंजस्य वाले संसार को रचकर प्रकट करने का दायित्व रखने वाला अस्तित्व है।
इसी को धार्मिक लोगों ने, मनुष्य को बुद्ध की संतान या ईश्वर की संतान कहा, लेकिन उस सार को प्रकट करने वाले लोग कम क्यों थे, तो इसलिए कि समय नहीं आया था।
लेकिन अब अलग है।
उस तथ्य को याद करने का समय आ गया है।
नहीं, हर किसी के उस तथ्य को याद कर सकने का समय आ गया है।
(अगली बार जारी)




