सच्ची खुशी की ओर कायांतरण-1
प्रकाशित अद्यतन
2024 में प्रवेश करने के बाद से, जीवन के सार को याद करने वाले लोग स्पष्ट रूप से बढ़ने लगे हैं।
ऐसे लोग पहले ही, किसी भी बात या चीज़ से फिर कभी न डगमगाने वाला, सार्वभौमिक सुख, शाश्वत खुशी पा चुके हैं।
फिर से कहता हूँ, उस अवस्था तक पहुँचने की कुंजी है, “भौतिक शरीर ही मनुष्य है, और मैं और दूसरे अलग अस्तित्व हैं” इस पुराने ढर्रे की स्मृति को “यह मेरी भावना नहीं” कहकर छोड़ देना।
यह “स्मृति को छोड़ना” ही, सच्ची खुशी पाने की कुंजी है।
क्योंकि स्मृति ही, अतीत के दोहराव वाले भाग्य को बनाते रहने का कारण रही है।
अच्छी तरह सोचें तो, मैं क्या कर सकता हूँ क्या नहीं, या मेरे पास क्या है क्या नहीं, ऐसे सोचने के ढंग, स्मृति के आधार पर निकाला गया दृष्टिकोण हैं।
अपने बारे में ऐसे पूर्व-निर्णय जिसमें कम होते हैं, वह अपनी सीमा का दायरा बढ़ाकर, जो नहीं कर पाता था उसे कर सकने के प्रयास से हार नहीं मानता।
दूसरी ओर, अपने बारे में पूर्व-निर्णय प्रबल हो, तो अहं का खोल तोड़ने में समय लगता है, और संकीर्ण संसार में भटकना आसान हो जाता है।
संसार बदलने जैसी बड़ी बात न भी हो, स्वयं को बदलने जैसे छोटे दायरे की बात भी, मनुष्य आसानी से मन के अनुसार नहीं कर पाता।

जब तक हर एक स्वयं को बदलने से शुरुआत न करे, पूरा संसार बेहतर नहीं होता।
इसके लिए, मनुष्य के मूल स्वभाव, जीवन के सार की खोज से शुरू करना आवश्यक है।
लेकिन पृथ्वी की बहुत सी मानवता के लिए, यही पहली कठिन बाधा बनी हुई है।
ऐसा क्यों हो गया है?
उसका कारण है, जीवन का फूल खिलाने के पोषण की कमी।
सरल शब्दों में कहें तो वह है, जीवन में खट्टे-मीठे सब मिलाकर तरह-तरह के अनुभव।
“दूसरों की भावना समझ नहीं आती” “दूसरों की स्थिति में खड़े होकर बातें नहीं सोच पाता” “समग्र को ऊपर से नहीं देख पाता” “हमेशा आत्म-केंद्रित हो जाता हूँ”
ऐसी मानसिक स्थितियाँ, पृथ्वी के हर व्यक्ति के पवित्रता को फिर से जगाने तक पहुँचने के लिए ज़रूरी रास्ता हैं।
इस प्रक्रिया से गुज़रे बिना कोई महान नहीं बनता।
अभी एकनिष्ठ कृतज्ञता वाले मन से जी रहे लोग, सब ऐसे अनुभव पूरी तरह कर चुके लोग हैं।
(अगली बार जारी)





