मानसिक स्पंदन और भौतिक स्पंदन के सूक्ष्म होने को सहारा देने के लिए-1
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दोहराव: असेंशन (आयामी उत्थान) क्या है?
असेंशन का अर्थ है, मानसिक स्पंदन और भौतिक स्पंदन को सूक्ष्म बनाकर, दिव्य-आत्मा स्पंदन तक ऊपर उठाना।
जापानी में इसे “जिगेन जोशो” यानी आयामी उत्थान भी कहा जाता है।
निराशा और घुटन से भरे इस पृथ्वी-लोक में, सचमुच टिकाऊ भविष्य खोलने के लिए हम में से हर एक को अभी जो सोचना और कर्म में उतारना है, वह है कि अपने मानसिक स्पंदन और भौतिक शरीर (पदार्थ) के स्पंदन को कैसे सूक्ष्म बनाया जाए, और उसके लिए ठोस अभ्यास।
यही, उस पर काम करने वाले लोगों को सबसे पहले, असेंशन (आयामी उत्थान) कराएगा।
उसकी गूँज और स्पंदन, अंततः परिवार, आसपास के लोगों और रहने वाले क्षेत्र आदि तक फैलते जाते हैं।
ऐसी सत्य में जड़ें जमाई जीवन-शैली वाले व्यक्ति जितने अधिक होंगे, पृथ्वी-लोक उतना ही आज की कठिन स्थिति को पार करके, महान सामंजस्य की दिशा के क़रीब पहुँचेगा।
महत्वपूर्ण यह है कि इसे अपने कर्मों में प्रकट करें।
ज्ञान, कर्म में प्रकट होने पर ही सचमुच जीवित होता है।
कर्म, आचरण और अभ्यास ही पृथ्वी के भाग्य को खोलने की कुंजी है।

असेंशन (आयामी उत्थान) पूरा करने के लिए
इसमें सबसे पहले जिस पर चेतना लगानी है, वह है “असेंशन (आयामी उत्थान) पूरा करने के लिए, मुझे ठोस रूप से किस पर काम करना चाहिए”।
ज़्यादातर मामलों में, मनुष्य जब कोई बड़ा “काम” पूरा करने की कोशिश करता है, तो पैरों के पास के जीवन और मानवीय संबंधों जैसी महत्वपूर्ण “बातों और लोगों” की उपेक्षा करने लगता है।
लेकिन सचमुच अभी सबसे पहले जिस पर काम करना है, वह है अपने जीवन और काम आदि की परिस्थितियों और मानवीय संबंधों के ज़रिए अपने भीतर निहित दिव्यता को प्रकट करके, उन्हें सामंजस्यपूर्ण बनाते जाना।
यही बुनियादों की बुनियाद है।
बहुत सामान्य होने के कारण निराशा लग सकती है, लेकिन इसे लापरवाही से छोड़ दें, तो आध्यात्मिकता में जड़ें जमाए बड़े आदर्श को साकार करना संभव नहीं।
मनुष्य की जीवन-शैली को, मोटे तौर पर दो में बाँटकर देखा जा सकता है।
- संसार के लिए, दूसरों के लिए वाली परोपकारी जीवन-शैली
- केवल अपनी और अपने क़रीबियों की सुविधा को प्राथमिकता देकर सोचने वाली आत्म-केंद्रित जीवन-शैली
पहली नज़र में, पहली जीवन-शैली आदर्श और सही रूप लगती है, लेकिन वास्तव में दोनों बहुत ज़्यादा एक ओर झुकी हैं।
सचमुच सही जीवन-शैली उन दोनों के बीच के ऊपर की ओर स्थित जीवन-शैली है, जो अपने आप को सामंजस्य में लाने के ज़रिए, स्वयं को जीवित रखते हुए साथ-साथ परोपकार का कार्य भी बन सके।
इसे मध्यम मार्ग वाली जीवन-शैली कहते हैं।
“अपने आप को सामंजस्य में लाने के ज़रिए, स्वयं को जीवित रखते हुए साथ-साथ परोपकार का कार्य भी बन सकने वाली जीवन-शैली” कहा, लेकिन ठोस रूप से समझ न आने वाली बात शायद यह है कि “अपने आप को सामंजस्य में लाना किसे कहते हैं”, और ज्ञान के रूप में वह समझ भी आ जाए तो “उसके लिए कैसी मानसिक तैयारी के साथ कैसे काम करें”।
मैं भी यह बिल्कुल न समझकर, दशकों तक साँस छोड़ने की तरह कर्म छोड़ते हुए, आसपास के लोगों को परेशान करने वाली, दूसरों के लिए कष्टदायक और स्वार्थी जीवन-शैली जी रहा था।
(अगली बार जारी)





