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दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

दिव्यता का पुनर्जागरण

मानसिक स्पंदन और भौतिक स्पंदन के सूक्ष्म होने में सहायता के लिए-2

प्रकाशित अद्यतन

अपने को सामंजस्य में लाने की नींव बनाना

सबसे पहले, अपने को सामंजस्य में लाने वाले जीने के ढंग को व्यवहार में लाने के लिए, बुनियादी ज्ञान के रूप में एक बात जानना ज़रूरी है।

वह यह पहचानना है कि दूसरों के वचन और कर्म जैसी, “पाँच इंद्रियों के ज़रिए पहचाने जाने वाले संसार के प्रति महसूस होने वाले विचार”, “आदमक़द दर्पण में अपना रूप देखने जैसे ही हैं।”

“क्या गालों की रंगत फीकी पड़ने लगी है?”, “थोड़ा मोटा होने लगा हूँ”, “आज चेहरे का रंग अच्छा है”, “आँखें लाल हैं”, इस तरह हम दर्पण देखते समय कोई न कोई राय बनाकर देखते हैं।

दर्पण देखकर कुछ न सोचने वाले लोग शायद ही होंगे।

“पाँच इंद्रियों के ज़रिए पहचाना जाने वाला संसार” ही, हर मनुष्य के लिए “भीतर के ब्रह्मांड को प्रतिबिंबित करने वाले दर्पण की भूमिका” निभा रहा है।

जब हम पाँच इंद्रियों के ज़रिए इस संसार का रूप देखते हैं, तब देखी, सुनी, छुई, सूँघी, चखी चीज़ों के बारे में कोई न कोई राय बनाते हैं।

“पाँच इंद्रियों से महसूस होने वाले इस संसार के रूप, और अपने व दूसरों के विचार, वचन और कर्म के बारे में, मेरी कोई राय नहीं बनती”, ऐसा व्यक्ति मिलना ही दुर्लभ होगा, मुझे लगता है।

यह वैसा ही है जैसे दर्पण देखकर कुछ न सोचने वाला कोई नहीं होता।

यह संसार और दूसरों का अस्तित्व, अपने भीतर के संसार को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है।

इसे स्वीकार कर पाना ही, “अपने को सामंजस्य में लाने वाले जीने के ढंग” की नींव, आधार बनता है।

अपने भीतर के सामंजस्य और असामंजस्य को पहचानने का तरीका

मान लेते हैं कि ऐसा “दिव्यता को प्रकट करके जीने के लिए मन की नींव का काम” पूरा हो गया, और अगली बात पर चलते हैं।

मनुष्य पाँच इंद्रियों के ज़रिए जो महसूस करता है, उसका विश्लेषण करते जाएँ, तो उसे प्रकृति और सारे जीवों के बारे में राय, और मानवता के वचन और कर्म के बारे में राय में बाँटकर देखा जा सकता है।

लेकिन, प्रकृति और सारे जीवों की आज की स्थिति देखते समय, मानवता के व्यवहार के प्रभाव को हटाकर नहीं देखा जा सकता, इसलिए अंततः हम संसार के बारे में जो महसूस करते हैं, वह “मानवता के विचार, वचन और कर्म के बारे में राय बनाना” ही है।

और, जब तक दिव्यता के संसार से इस संसार को देखने के चरण तक न पहुँचे हों, तब तक उसका अधिकांश “अपने भीतर नज़र डालने से पहले, बाहर की ओर की राय” है, यह कहा जा सकता है।

वह किसने किया, उसने किया, वह व्यक्ति अच्छा, यह व्यक्ति बुरा, तुम पसंद हो पर वह नापसंद, उसने मेरा अपमान किया, मैं उस व्यक्ति के क़रीब जाना चाहता हूँ, उसने मुझे धोखा दिया, मेरी भावनाओं का ध्यान रखा गया…।

भौतिक शरीर में रहकर जीते इस जीवन में, हम रोज़ सच में तरह-तरह की राय बनाते हुए जीते हैं।

अपने को सामंजस्य में लाने वाले जीने के ढंग में सबसे महत्वपूर्ण बात है, उन तरह-तरह की रायों को ध्यान से देखकर, यह पहचानना कि वे सब अपने ही बारे में राय हैं।

और उस राय के बनते समय, “मेरे विचार अशांत हैं या नहीं”, इसे अच्छी तरह देखना।

क्योंकि कोई राय बनते समय मन की दशा देखकर, अपने भीतर के सामंजस्य और असामंजस्य को पहचानना संभव हो जाता है।

(अगली बार जारी)

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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