मनुष्य से जुड़ी अशुद्ध लगने वाली बातों के बारे में (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
«कल से जारी»
★भविष्य के मुझसे अतीत के मुझको
⑤ चेतना और विचारों का अंतर
अभी मैंने कहा, “शरीर चेतना का बनाया वाहन है,” तो यहाँ चेतना और विचारों के अंतर की पुष्टि कर लें।
यह बात अभी यहाँ क्यों? क्योंकि जब तक “मनुष्य स्वयं चेतना है, विचार बिल्कुल नहीं” यह सत्य समझ में न आए, तब तक “शरीर ही मैं हूँ” वाली गहरी गलतफ़हमी नहीं सुलझती।
तो एक बात स्पष्ट कर दूँ: “चेतना और विचार दोनों आँख से न दिखने, हाथ से न छूने वाले मानसिक स्पंदन हैं,” इस अर्थ में दोनों एक जैसे लगते हैं, लेकिन उनकी स्वतंत्रता में सचमुच ज़मीन-आसमान का अंतर है।
चेतना में ज़रा भी असुविधा नहीं है।
लेकिन विचार असुविधाजनक हैं।
क्योंकि विचार शरीर नाम के कोकून में लिपटी अवस्था में पैदा हुआ मानसिक स्पंदन है, इसलिए “मैं शरीर हूँ” वाले आत्म-बंधन के खोल से बाहर नहीं निकल पाता।
और वहीं तरह-तरह की पीड़ाएँ पैदा हो रही हैं।
इस बार के प्रश्न से संबंध नहीं, लेकिन जीने की चिंताओं में बूढ़े होने की चिंता, रोग का दुख, मृत्यु का भय आदि हैं, और हर पीड़ा का उद्गम चेतना नहीं, विचार हैं।
उन विचारों से मिलती-जुलती पर अलग चीज़ चेतना है, और चेतना जीवन के स्वतंत्र प्रकाश की लय के मानसिक-स्पंदन पक्ष की अभिव्यक्ति और उसका कार्य है।
इसलिए असली चेतना और चेतना समझे गए विचार बिल्कुल अलग चीज़ें हैं।
सिवाय इस एक बिंदु के कि “दोनों जीवन-प्रकाश के आधार पर चलने वाली ऊर्जा हैं।”
⑥ बढ़ने के साथ उठने वाली चिंताओं के बारे में
अब बात पर लौटकर जन्म के बाद की बात करते हैं।
हर व्यक्ति जन्म के तुरंत बाद से बचपन तक बड़े लाड़ से पाला जाता है, फिर अहं-चेतना बनती है, और माता-पिता के साथ-साथ चले बिना अकेले घूमने-फिरने लगता है।
किशोरावस्था में प्रवेश करने पर स्त्री-पुरुष दोनों में शारीरिक विशेषताएँ स्पष्ट प्रकट होती हैं, अपने लिंग का बोध होता है और उससे जुड़ी चिंताएँ भी बढ़ती हैं।
इसके अलावा अहं के जागने से तरह-तरह की इच्छाएँ सतह पर आती हैं।
कुछ लोग मल-त्याग को असुविधाजनक महसूस करते हैं और परेशान होते हैं कि ऐसी क्रिया क्यों है।
असल में अगर माता-पिता या दादा-दादी परेशान किशोर-किशोरियों को मनुष्य के जीवन और शरीर के सत्य के बारे में बता दें, तो सब बिना परेशान हुए स्वस्थ रूप से बढ़ सकते हैं, लेकिन अब तक समय नहीं आया था, और इस तरह परेशान होना भी ज़रूरी अनुभव था।
⑦ मल-त्याग की क्रिया के बारे में
यहाँ से बात थोड़ी अशिष्ट होगी, लेकिन मल-मूत्र आना, पसीना आना जैसी उत्सर्जन क्रियाओं के बारे में बात करते हैं।
इस बारे में सब शर्माते हैं और ऐसी चिंताएँ रखते हैं जिन पर किसी से सलाह नहीं कर पाते, लेकिन तरह-तरह की चिंताओं में ○○ का प्रश्न यह रहा है: [मल-त्याग = गंदा], इसलिए ऐसी क्रिया वाला मनुष्य दिव्य अस्तित्व है, यह बात जमती नहीं।
अब तक की बात से मोटा अंदाज़ा लग गया होगा, लेकिन अगर यह तथ्य समझ लो कि मनुष्य शरीर में सवार चालक है और शरीर एक कोमल वाहन है जो चालक के जाते ही मिट्टी में लौट जाता है, तो थोड़ा साफ़ नहीं लगता?
कार से समझाऊँ, तो आजकल ईंधन-सेल कार जैसी हाइड्रोजन जलाकर चलने वाली कारें आने लगी हैं, लेकिन अब तक की कारें पेट्रोल या डीज़ल जलाकर इंजन चलाती थीं।
और जलाए गए ईंधन का कचरा निकास-गैस के रूप में हवा में निकाला जाता था।
उसी तरह अब तक के मनुष्य भौतिक भोजन के आधार पर शरीर बनाए रखते और अनावश्यक पदार्थ विविध उत्सर्जन क्रियाओं से शरीर के बाहर निकालते आए हैं।
जैसे कार ईंधन जलाकर इंजन घुमाकर चलती है, वैसे शरीर भीतर लिए भोजन और साँस से लिए आत्मिक तत्व से ज़रूरी पोषक तत्व लेता है, और पोषक तत्व लेने के बाद बचा कचरा मल बनकर शरीर से बाहर निकाला जाता रहा है।
जैसे कार के दहन का कचरा निकास-गैस के रूप में छोड़ा जाता है।
इस तरह उत्सर्जन क्रिया मनुष्य के जीवन का अपना काम नहीं, बल्कि वाहन के रूप में शरीर में लगी क्रिया थी।
मनुष्य का वास्तविक रूप पूरी तरह चेतना और मन है, और वह «जीवन के प्रकाश» से सीधे जुड़ा मानसिक स्पंदन, प्रकाश की लय है।
इसके विपरीत शरीर भौतिक स्पंदन का वाहन है जो चेतना के निकलते ही सूख जाता है और श्मशान में न जलाया जाए तो प्रकृति में तत्वों के रूप में लौट जाता है।
इसलिए उत्सर्जन क्रिया को घृणित समझने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी।
खुद को भौतिक जगत में काम करने देने वाला महत्वपूर्ण वाहन, वही शरीर है, इसलिए कृतज्ञता तो हो, हीन समझने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं।
दुनिया के सबसे सुंदर पुरुष या स्त्री में भी कोई एक ऐसा नहीं जो मल-त्याग किए बिना जीता हो।

⑧ तरह-तरह की इच्छाओं के बारे में
अब काम-वासना, भूख, धन-लालसा, सत्ता-लालसा के बारे में, और इस कारण के बारे में कि ये भी ज़रूरी चीज़ें हैं, बात करते हैं।
क्या कभी सोचा है कि अगर मनुष्य से सारी इच्छाएँ मिट जाएँ तो दुनिया कैसी होगी?
काम-वासना मिट जाए, तो जान-बूझकर कष्ट सहकर भी बच्चा गर्भ में लेने वाला कोई नहीं रहेगा।
भूख मिट जाए, तो जिस दुनिया में यह विश्वास विकसित नहीं हुआ कि सिर्फ़ आत्मिक तत्व से भी मनुष्य जी सकता है, वहाँ सभी लोग कुछ महीने भी न टिककर भूख से मरकर खत्म हो जाएँगे।
मूल्य को पैसे में मापकर लेन-देन करने वाले मुद्रा-अर्थव्यवस्था समाज में कमाना छोड़ दिया, तो परिवार नहीं पाला जा सकता, अकेला व्यक्ति भी नहीं जी सकता।
सत्ता-लालसा, शक्ति-लालसा, तरक्की की लालसा जैसे भाव मिट जाएँ, तो “बड़ी मछली छोटी को खाए” वाला प्रतिस्पर्धी समाज न रहकर आदर्श दुनिया बन जाएगी, ऐसा भ्रम हो सकता है, लेकिन पृथ्वी की मानवता अभी की मानसिक अवस्था में ऐसा हो जाए, तो बहुत-से लोग काम में भी लापरवाही से आराम करके, खेलते हुए जीना चुनेंगे।
ऐसा हुआ तो दुनिया कैसी होगी, समझते हो।
इस तरह, आज तक की मानवता के चेतना-स्तर के अनुरूप स्वरूप ही अब तक की इच्छाओं का स्वरूप था।
यह इसलिए कि अब तक पृथ्वी का स्पंदन-लोक मोटी गूँज की दुनिया था, और अब तक जो देखा गया, वह प्रकाश पड़ने पर बनने वाली पदार्थ की छाया जैसा था। सिर्फ़ उस छाया को देखकर “यही मनुष्य का वास्तविक रूप है” तय कर लेना बहुत अफ़सोसजनक देखने का ढंग था।
लेकिन अब से अलग है।
यह आत्मिक आयाम की बात है, भौतिक जगत की सामान्य बुद्धि से मेल नहीं खाती, इसलिए इसे पूरी तरह रूपक के रूप में लो: आने वाली दुनिया मानसिक स्पंदन और भौतिक स्पंदन दोनों के आत्मिकीकरण की दुनिया है, इसलिए ऐसी दुनिया बनती जाएगी जहाँ प्रकाश पड़ने पर भी छाया नहीं बनती।
असल में छाया होती है।
लेकिन सब सूक्ष्म और पारदर्शी।
ऐसी दुनिया होगी जहाँ अब तक की तरह छाया देखकर उसे वास्तविक समझने की गलती कोई कर ही नहीं सकता।
⑨ भूख का भविष्य
और जोड़ दूँ, भूख नाम की चीज़ अभी-अभी असेंशन की हुई दुनिया में होती तो है, पर बेहद हल्की हो जाती है।
पहले खाने का उद्देश्य बदलता है।
भोजन लोगों के बीच मेल-जोल को सहज बनाने का साधन बन जाता है, और पेट खाली है इसलिए खाना चाहना खत्म होता जाता है।
अब से पृथ्वी पर भी चरणबद्ध रूप से बदलेगा, पहले दिन में तीन बार से दो बार, दो से एक, दिन में एक से कुछ दिनों में एक, इस तरह थोड़ा-थोड़ा घटता जाएगा।
धीरे-धीरे इच्छा से हिलाने वाली भूख अपने-आप मिट जाती है।
⑩ उत्सर्जन का भविष्य
उत्सर्जन में व्यक्ति-व्यक्ति में अंतर है, लेकिन आत्मिकीकरण जितना बढ़ता है उतनी मात्रा घटती है, और अंततः मिट जाती है।
यानी, ज़रूरत घटती जाती है।
क्योंकि शरीर से निकालने योग्य मानसिक स्पंदन और भौतिक स्पंदन के विष और अशुद्धियाँ आत्मिकीकरण के साथ मिटती जाती हैं।
इस तरह उत्सर्जन और विविध इच्छाओं का छाया-पक्ष असेंशन के साथ मिटता जाता है, इसलिए निष्कर्ष यह है कि “कोई भी बात चिंता करने लायक नहीं।”
इसलिए अभी सब कुछ को अच्छा-बुरा फ़ैसला न करके, हर रूप को जैसा है वैसा स्वीकार करके, बस कृतज्ञता का प्रकाश डाल दो।
सभी अस्तित्वों की गहराई में काम करने वाले «जीवन के प्रकाश» को ही देखते हुए।






