भविष्य की ऊर्जा के बारे में
प्रकाशित अद्यतन
★भविष्य की ऊर्जा
आज, आने वाली पृथ्वी पर भी इस्तेमाल होने वाली “भविष्य की ऊर्जा” कैसी है, इसे जितना हो सके आसानी से बताना चाहता हूँ।
एक शब्द में, हाँ, “जीवों को चलाने वाली शक्ति” कहूँ तो समझ आएगा?
जिस «जीवन के प्रकाश» की बात हमेशा करता हूँ।
जीव यानी, आज की पृथ्वी की सामान्य बुद्धि में, मनुष्य और अन्य पशु।
और कीड़े, मछली-सीप, पौधे भी, यानी “जीवित” माने जाने वाले सभी प्राणियों को चलाने वाली शक्ति।
वह एक निश्चित चरण का असेंशन (आत्मिकीकरण, आयामी उत्थान) पूरा करने के बाद की पृथ्वी पर रासायनिक उद्योग के क्षेत्र में भी लागू होगी और कारखानों की मशीनों, तरह-तरह के वाहनों और बिजली के उपकरणों को चलाने वाली शक्ति बनेगी।
तब तक सिर्फ़ पदार्थ माने जाने वाली “वस्तु में बसे जीवन” और “मानवता के जीवन” के बीच अनुनाद की तकनीक खुलेगी, और उसके बाद सारी वस्तुएँ मानवता के शरीर का विस्तार बनकर हर पदार्थ को स्वतंत्र रूप से बरता जा सकेगा।
ऐसा होने पर, जहाँ अब तक गैस, तेल, कोयला जलाने वाली ताप-बिजली, जल-पवन-सौर बिजली आदि से ऊर्जा लेकर चीज़ें चलाई जाती थीं, वहाँ [अंतरिक्ष में अनंत रूप से भरा जीवन-स्पंदन] औद्योगिक रूप से भी इस्तेमाल हो सकेगा, और ऐसा युग आएगा जब किसी को ऊर्जा-समस्या सोचने या प्रदूषण की चिंता करने की ज़रूरत नहीं होगी।
★सबमें जीवन स्वीकार करने वाले युग को लाने के लिए
यह उस युग की बात है जब “सब कुछ जीवित है” यह तथ्य पूरी मानवता बिल्कुल स्वाभाविक रूप से, स्वाभाविक मान्यता के रूप में मानती है।
तुम्हारी अब तक की सामान्य बुद्धि में खनिज, जल, वायु में जीवन बसे होने को मानने वाले बेहद कम थे।
“सिर्फ़ सक्रिय रूप से हिलने वाली चीज़ों में जीवन है” यह गलतफ़हमी थी।
कुछ लोग तो पौधों में बसे जीवन को पहचाने बिना पौधों के साथ लापरवाही करते थे।
इस दृष्टि से देखो, तो पृथ्वी से कम नाता रखने वाले अन्य तारों के लोग “पृथ्वी की मानवता अभी विकास के बीच में है” मानते थे, यह समझ आता है।
अभी कहा, नई सभ्यता की दुनिया में सब कुछ में जीवन बसे होने को हर कोई स्वाभाविक मान्यता के रूप में समझता है।
यानी खनिज, जल, वायु तो हैं ही, उन्हें मिलाकर बनाए गए कृत्रिम पदार्थों में भी जीवन बसा होना सहज रूप से देखा और सोचा जाता है।
★आज के तुम भी जीवन से घिरे जी रहे हो
तुम अभी यह लेख किस उपकरण पर देख रहे हो?
स्मार्टफ़ोन हो तो स्मार्टफ़ोन में भी जीवन है।
कंप्यूटर हो तो कंप्यूटर में भी जीवन है।
टैबलेट हो तो टैबलेट में भी जीवन है।
जिस कुर्सी या सोफ़े पर बैठे हो, जिस मेज़ के सामने हो, जिस घर में रहते हो, घर के हर सामान में भी, सबमें जीवन है।
जिस ट्रेन, कार, हवाई जहाज़ में सवार हो, धरती में, वायु में, शहर के हर पदार्थ में, सब-सबमें जीवन है।
जब तक सबमें जीवन स्वीकार न करने वाला युग है, तब भी सच यह है कि हर वस्तु में जीवन है।

★उड़न तश्तरी के चलने का सिद्धांत
जिस उड़न तश्तरी में हम सवार हैं, वह किस सिद्धांत से चलती है? इस अंतरिक्ष यान की कच्ची सामग्री, खनिजों को मिलाकर बने विविध पुर्ज़ों-भागों में बसे जीवन और कप्तान के जीवन की मिली-जुली जीवन-ऊर्जा शक्ति-स्रोत बनकर चलाती है।
कहें तो उड़न तश्तरी का ढाँचा कोने-कोने तक कप्तान की चेतना से व्याप्त, कप्तान के शरीर का विस्तार है।
इसलिए चलना और रुकना दोनों स्वतंत्र, और पृथ्वी के देहधारी मनुष्यों की नज़र में चौंकाने वाली गति से अंतरिक्ष में यात्रा करना भी आसान है।
क्योंकि उड़न तश्तरी कप्तान का आत्मिक शरीर, स्वयं चेतना है।
ईंधन खत्म होने की चिंता भी नहीं, इसलिए “अरे, ईंधन भरना है” सोचने की ज़रूरत भी नहीं।
दूसरे तारे पर उतरते समय हर तारे की विशेष आवृत्ति से स्पंदन-समायोजन ज़रूरी होता है, इसलिए कप्तान मन-तरंग से सावधानी से समायोजन करते हुए यान चलाता है, लेकिन विशाल अंतरिक्ष में यात्रा करते समय स्वचालित मोड पर रखकर यान के भीतर सब बातचीत करते हुए समय बिताते हैं।
★उड़न तश्तरी के शक्ति-सिद्धांत को जानने के लिए
ऐसी ऊर्जा क्या है इसका एक अंश जानने के लिए, अब जैसा कहूँ वैसे हाथ हिलाओ।
दोनों हथेलियाँ आँखों के सामने लाओ।
पीठ नहीं, हथेलियाँ अपनी ओर करके, धीरे-धीरे मुट्ठी बंद-खोल, बंद-खोल करो।
फिर गति बढ़ाते जाओ और अचानक रोक दो।
आसान है न?
अब जब समय हो, सचेत रूप से चलना, दौड़ना, रुकना दोहराओ।
बाधा हो या किसी से टकराने वाले हो तो बचो।
यह भी आसानी से हो जाता है।
चलाना भी स्वतंत्र, रोकना भी स्वतंत्र।
बाधा हो तो बचना भी स्वतंत्र।
ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ हिलाना भी स्वतंत्र।
वह चलाने वाली शक्ति क्या है?
अपने-आप चलता है?
तो अपने-आप चलाने वाली ऊर्जा क्या है?
जीवन, है न?
जीवन «जीवन के प्रकाश» पर आधारित ऊर्जा, शक्ति-स्रोत है।
इसलिए मनुष्य को चलाने वाली शक्ति «जीवन का प्रकाश» है।
मनुष्य को चलाने वाली ऊर्जा से, आज की औद्योगिक ऊर्जा की तरह, तन-मन चलाने पर वायु या धरती प्रदूषित नहीं होती।
कुछ लोग कहते हैं “मानवता जीने भर से कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ती है, इसलिए पृथ्वी को गंदा करती है,” लेकिन CO2 की समस्या इसलिए है कि मूल जंगलों को अंधाधुंध काटकर कम कर दिया गया। पृथ्वी के पौधों की मात्रा पहले जैसी बढ़ा दो और जीवन-ऊर्जा को पदार्थ चलाने की ऊर्जा बना दो, तो ऐसी चिंता बिल्कुल नहीं।
शरीर चलाने की बात पर लौटें, अगर तुम “इससे ज़्यादा असंभव” की सीमा न बनाओ, तो शरीर चलता रह सकता है।
जैसे, अगर कार तुम्हारा शरीर हो तो?
कल्पना करो कि कोने-कोने तक तुम्हारी चेतना से व्याप्त तुम्हारा शरीर कार बनकर सड़क पर दौड़ रहा है।
उस समय इसे अभी अपने पैरों से सड़क पर चलने की बात के साथ मिलाकर देखो।
सब ऐसे हो जाएँ, तो खतरा भाँपकर रुकना या बचना आसानी से हो जाएगा।

★औद्योगिक ऊर्जा में मानवता की जीवन-ऊर्जा का उपयोग करने के लिए
मानवता में बसे ब्रह्मांडीय सृजन-ऊर्जा से सीधे जुड़े जीवन-स्पंदन को पदार्थ के मूल जीवन से मिलाकर एकाकार कर लो, तो ऐसा संभव हो जाता है।
लेकिन… यह संभव होने के लिए पृथ्वी के भौतिक जगत का आयाम सूक्ष्म होना ज़रूरी है।
इसके लिए मानव-चेतना का आत्मिकीकरण अनिवार्य है।
इसमें “बस थोड़ा और” कहना चाहता हूँ, लेकिन पूरी पृथ्वी को देखो तो अभी बहुत बाकी है।
कुछ विशेष भूमि पहले ही पाँच-आयामी स्पंदन-लोक तक पहुँच चुकी है, और कुछ क्षेत्र साढ़े तीन से चार-आयामी स्पंदन-लोक में प्रवेश कर चुके हैं।
लेकिन पूरी पृथ्वी का औसत स्पंदन-लोक तीसरे आयाम के पूर्वार्ध से मध्य के बीच चल रहा है।
इसलिए सबसे पहले पृथ्वी पर रहने वाली मानवता की चेतना को, एक भी ज़्यादा व्यक्ति की चेतना को, दिव्यता के स्पंदन-लोक में उन्नत करके उन लोगों की भूमि के स्पंदन-लोक को सूक्ष्म करना होगा।
★पृथ्वी के आयाम को सूक्ष्म करने के लिए
इसका सबसे आसान तरीका है ब्रह्मांड की अनंत ऊर्जा से सीधे जुड़ी कोतोदामा वाली प्रार्थना और हर समय की गहरी साँस को मिलाकर जीने का ढंग।
परोपकार की प्रार्थना को साँस लेने जैसा बना लो।
सब खुश रहें।
पूरी मानवता की दिव्यता याद आए।
सोचना सिर्फ़ दिव्यता के अनुरूप।
कहना सिर्फ़ दिव्यता के अनुरूप शब्द।
करना सिर्फ़ दिव्यता के अनुरूप कर्म।
इस तरह दिव्य चेतना पर आधारित विचार-वचन-कर्म प्रकट करने वाली मानवता जितनी बढ़े, धरती का आयाम उतना सूक्ष्म स्पंदन में लौटता है और जीवन-ऊर्जा की स्वतंत्रता आसानी से प्रकट होने वाला वातावरण तैयार होता है।
इसलिए महत्वपूर्ण है सिर्फ़ सपना देखना नहीं, बल्कि यह बोध कि तुम पृथ्वी के उज्ज्वल भविष्य को बनाने वाले सदस्य हो, और पैरों के नीचे का एक-एक कदम जाँचते हुए रोज़ का जीवन लगन से, धीरे-धीरे, चेतना-विकास के मार्ग के रूप में चलना, यही बात है।






