जीवन-विज्ञान और चिकित्सा की उचित दिशा
प्रकाशित अद्यतन
★जीवन-विज्ञान और चिकित्सा के स्वरूप के बारे में
जीवों के शरीर, खासकर मानव शरीर से जुड़े विज्ञान या चिकित्सा की सचमुच उचित दिशा मूल रूप से यह होनी चाहिए कि जीवन की क्षमता को अधिकतम प्रकट करने के लिए उसके सार को स्पष्ट करके लागू करे।
लेकिन पृथ्वी पर आज तक का विज्ञान जीवन के रहस्य को खोलने की दिशा में न जाकर, भौतिक जीव-शरीर के रूप में पहचानी गई वर्तमान स्थिति को बदलने में उलझ गया, पशु और मनुष्य को मिलाकर देखा, डीएनए की खोज तक तो ठीक थी, लेकिन सतही संयोजन बदलने में अभी बहुत-सी शक्ति लगाई जा रही है।
चिकित्सा ने अंग-प्रत्यारोपण और लक्षण-दर्द कम करने वाले इलाज से बहुत-से लोगों के जीवन और रहन-सहन को सहारा दिया है। उसके ऊपर, अब से दर्द की गहराई के कारण पर भी और प्रकाश पड़ेगा।
हर अभिव्यक्ति के पीछे वैसा प्रकट होने योग्य मूल स्पंदन है।
तुम्हारे लिए आसानी से कहूँ तो कारण है, कह सकते हो।
सच कहूँ तो परिणाम पहले है, और जो प्रकट है वह सब प्रकट होने के लिए ही प्रकट है, लेकिन अभी के चरण में तुम्हारी ओर से देखने पर कारण पहले है और वह परिणाम के रूप में प्रकट होता दिखता है।
आज तक की चिकित्सा ने प्रकट शारीरिक लक्षणों का उपचार करके बहुत-से लोगों की मदद की है। उसमें मन की गहराई के कारण का उपचार भी जुड़े, तो और गहरा उपचार होता है।

★चोट ~ शरीर के बाहरी नुकसान के बारे में
जैसे, किसी को चोट लगती है और शरीर को नुकसान होता है।
ऐसे में आधुनिक चिकित्सा प्रकट नुकसान की मरम्मत करके अनमोल जीवन की रक्षा करती है।
चोट के कारण लापरवाही, अप्रत्याशित दुर्घटना, युद्ध या आतंकवाद में फँस जाना, तरह-तरह के हैं, और घायल व्यक्ति को कभी दोष नहीं दिया जाना चाहिए, लेकिन उसकी गहराई में मानवता के पिछले जन्मों से दोहराए विचार-आदतों का प्रभाव भी है, ऐसा हम देखते हैं। इसलिए शरीर के घाव का इलाज करने के साथ मन के घाव को भी कोमलता से भरना महत्वपूर्ण है।
इस तरह शरीर के इलाज के साथ मन की गहराई के कारण का भी उपचार करो, तो वैसी बात दोहराना मुश्किल हो जाता है।
★रोग ~ शरीर के भीतरी नुकसान के बारे में
रोग भी वैसा ही है।
जैसे, जिगर, अग्न्याशय, तिल्ली, पेट या आँतों में “गाँठ” बनना, छेद होना, पत्थर जैसा ढेला बनकर रुकावट होना।
कहा जाता है कि इसमें जीवनशैली और खान-पान का बड़ा संबंध है, लेकिन हमारी नज़र से उसकी गहराई में चेतना का उपयोग भी जुड़ा है। भावों को ब्रह्मांड के सत्य, महान सामंजस्य से हटी अवस्था में रखकर, जिन “तरह-तरह की बातों” को सोचने की मूल रूप से ज़रूरत नहीं, उन्हें “यह-वह” लगातार रटते रहना भी पेट, आँत, गुर्दे, जिगर, अग्न्याशय, तिल्ली आदि की गड़बड़ी का एक कारण बन सकता है।
क्योंकि उदर भावों के जमा होने की आसान जगह है।
और उदर में जमा होने वाले भावों की प्रवृत्ति अंतर्मुखी भाव, खुद के भीतर दबाकर रोक लेने वाले अंतर्मुखी भावों की लहर है, जो जैसे कीचड़ पानी के तल में जमती है वैसे जमा होती है, शुरू में सूक्ष्म स्पंदन थी, फिर धीरे-धीरे स्पंदन मोटा होकर भौतिक बनता है और शरीर के लक्षण के रूप में प्रकट हो सकता है।

★वही नियति न दोहराने के लिए जानने योग्य बात
चोट में बहिर्मुखी भावों का संचय, रोग में अंतर्मुखी भावों का संचय जुड़ा हो सकता है, और वे प्रकट होकर मिटने की कोशिश कर रहे हैं, यह पहलू भी है।
दोनों में, प्रकट होने पर असल में हिसाब साफ़ (क्लियर) हो जाता है और वही बात दोबारा नहीं होनी चाहिए, लेकिन पृथ्वी के मनुष्यों को ध्यान से देखो तो वही बात कई-कई बार दोहराते हैं।
तुम्हें क्या लगता है, इसका कारण क्या है?
क्योंकि चोट या रोग के बाद, जैसे बारिश से हवा साफ़ हो गई हो वैसे साफ़ हुए मन के आकाश को फिर उन्हीं आदत वाले विचारों के बादलों से ढक देते हैं।
मनुष्य के सत्य-भूले आदत वाले विचार प्रकाश-रासायनिक धुंध की तरह मन को गंदा करते हैं, और कभी न कभी वह शरीर की नियति पर भी असर डालकर चोट या रोग का एक कारण बन जाता था।
इसलिए मनुष्य के लिए “चेतना का उपयोग” सबसे महत्वपूर्ण है और इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं, यह पूरी मानवता को पता चल जाए, तो हर व्यक्ति की नियति काफ़ी सुधार की दिशा में बढ़ेगी।
★पृथ्वी के विज्ञान और चिकित्सा में ब्रह्मांड की सामान्य बुद्धि लाने के लिए
इसके लिए फिर भी, चेतना का विकास पूरा कर चुके या कर रहे तुम लोगों का अस्तित्व ज़रूरी है।
लेकिन इसलिए ज़ोर लगाने या दबाव महसूस करने की कोई ज़रूरत नहीं।
जैसे हो वैसे ठीक हो।
जैसे हो वैसे तुम्हारी ज़रूरत है।
तुम वहाँ होने भर से तन-मन से सत्य की गूँज बिखेरते हो, इसलिए बस भौतिक जगत में रहकर सामंजस्यपूर्ण प्रार्थना की लहर छोड़ते रहो, तो बाकी हर व्यक्ति के अपने संरक्षक आत्मा-देवता, उद्धार के महा-दिव्य समूह के लोग, और हम तारों के भाई-बहन तुम्हारी मन-तरंग से एकाकार होकर ब्रह्मांडीय हृदय का करुणा-प्रकाश (सारे पदार्थ और मन की मूल गूँज) पृथ्वी-जगत में बहाकर, सारी आत्म-विघटन क्रिया को न्यूनतम हानि पर रोककर, सामंजस्य में नई सभ्यता की दुनिया में ले जाने की योजना है।
यह हमारा और तुम्हारा साझा काम है, एक भी कम हो तो नहीं चलता।
नई पृथ्वी को नया जन्म देने के लिए तुम्हारी शक्ति चाहिए।
तुम्हारे संरक्षक देवता-आत्माएँ तो हैं ही, परलोक में तुम्हारे सारे सगे-संबंधी भी तुम्हारे इस ब्रह्मांड-स्तर के साझा काम में भाग लेने से खुश हैं।
क्योंकि तुम अकेले ऐसा करो, तो पीछे जुड़े हज़ारों-लाखों लोग दिल से उद्धार पाते हैं।
हम भी उत्साह बढ़ा रहे हैं।
इसलिए निश्चिंत होकर, “सब कुछ ज़रूर बेहतर होगा” के महान निश्चय से, महा-सुख-शांति का सामंजस्य-स्पंदन धरती पर प्रसारित करते रहो।
यही सीधे धरती के आयाम को आत्मिक बनाकर ब्रह्मांड की वैज्ञानिक शक्ति को पृथ्वी पर लाने की प्रेरक शक्ति बनता है।
और ऐसा होने पर ही पहली बार, अभी सत्य में रुचि न ले पाने वाली मानवता को भी चेतना-विकास का महत्व समझ आएगा और पूरे पृथ्वी तारे की और पूर्णता की राह खुलेगी।







