संरक्षक आत्मा से संचार के बारे में
प्रकाशित अद्यतन
★संरक्षक आत्मा से संचार के बारे में
आज हाल में तुम्हारे मन में उठे, “संरक्षक आत्मा से संचार” वाली किताबों के प्रश्न का उत्तर देने के रूप में बात करते हैं।
प्रश्न है: “क्या किसी बिल्कुल अजनबी के संरक्षक आत्मा से साक्षात्कार संभव है? अगर हो भी, तो दूसरे की निजता से जुड़ी सामग्री को उसकी अनुमति के बिना किताब बनाना ठीक है?” इसका उत्तर बिल्कुल वही है जो आम तौर पर सब सामान्य बुद्धि से सोचते हैं।
★दूसरे के संरक्षक आत्मा से साक्षात्कार संभव है?
पहले, “क्या बिल्कुल अजनबी के संरक्षक आत्मा से साक्षात्कार किया जा सकता है,” तो मैं दावे से कहता हूँ कि संरक्षक आत्माएँ ऐसी पुकार पर कभी प्रतिक्रिया नहीं देतीं।
संरक्षक आत्मा, शायद पहले कहा हो, उस व्यक्ति के लिए विशेष उच्च देवता है, आत्मा के विकास को परदे के पीछे से सहारा देने वाला अद्भुत अस्तित्व, जो अपने संरक्षित भौतिक मनुष्य को भी अपना नाम नहीं बताता, बस परदे के पीछे से तुम्हें सहारा देता है। इसलिए उस व्यक्ति की आत्मा के विषय, वर्तमान स्थिति, उसके प्रति भाव किसी अजनबी को खुलकर बताना बिल्कुल असंभव है।
★संरक्षक आत्मा की स्थिति के बारे में
संरक्षक आत्मा की स्थिति ऐसी हल्की नहीं जिस पर बातूनी, उथले चेतना-स्तर की आत्मा पहुँच सके।
और उससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि संरक्षक आत्मा उस व्यक्ति की आत्मा का माता-पिता है, और आत्मिक वंशावली को मूल तक ले जाओ तो उस व्यक्ति की दिव्य चेतना का हिस्सा भी है।
और दिव्य चेतना होने का मतलब यह भी है कि वह ऐसा अस्तित्व है जो तीन लोकों के कर्म-विचार स्पंदन से उपजे कारण-परिणाम के बंधन में एक-एक बात पर उलझता या जुड़ता नहीं।
संरक्षक आत्मा का काम अपने संरक्षित व्यक्ति की आत्मा के विकास का संचालन और अच्छी दिशा देना है, और जिनके संरक्षित व्यक्ति ने एक निश्चित चरण का चेतना-विकास पूरा कर लिया है, उनके अलावा लगभग सभी संरक्षक आत्माएँ इसी में पूरी तरह व्यस्त हैं।
क्यों? क्योंकि भौतिक मनुष्य को कितना भी बचाओ-रक्षा करो, बुरी भविष्य की नियति को सपने में चित्रित करके मिटाओ-शुद्ध करो, कितना भी सुधारो, वह फिर पुराने भावों की आदत में लौट जाता है और नियति की उफनती लहरों में दुख पाता है, ऐसे लोग बहुत हैं।
★कुछ संरक्षक आत्माओं का मुख्य काम के अलावा ध्यान देना
इसलिए संरक्षक आत्मा के अपने संरक्षित भौतिक मनुष्य की रक्षा के दायित्व के अलावा किसी बात पर ध्यान देने का अगर कोई मामला है, तो बस यह विशेष अपवाद है कि जिनका संरक्षित व्यक्ति चेतना-विकास में आगे बढ़कर पूरी पृथ्वी के महान सामंजस्य की प्रार्थना कर सकता है, सिर्फ़ उन संरक्षक आत्माओं को उद्धार के महा-दिव्य समूह में दोहरी सदस्यता की अनुमति है, और संरक्षित भौतिक मनुष्य जब पूरी मानवता की खुशी की प्रार्थना कर रहा होता है, उस समय का उपयोग करके संरक्षक आत्मा पूरी पृथ्वी के विकास के संचालन के बड़े काम में भाग ले सकता है।
इसके अलावा किसी भी बात में संरक्षक आत्मा शामिल नहीं होता।
यह जान लो, तो संरक्षक आत्मा का व्यक्ति की छिपी भीतरी बातें अजनबी को बताना असंभव है, यह सामान्य सोच से भी समझ आता है।
★दूसरों की निजता के उल्लंघन के बारे में
और दूसरा प्रश्न, दूसरे की निजता से जुड़ी सामग्री को उसकी अनुमति के बिना किताब बनाना कैसा है, इसे बस तुम्हारी दुनिया की सामान्य बुद्धि पर तौलकर सोच लो।
पैसा कमाने, काम-वासना, आत्म-प्रदर्शन या सत्ता-लालसा के लिए दूसरों का उपयोग करना या नीचा दिखाना अंततः खुद को भी गहरी पीड़ा देता है।
इसलिए न्याय-भावना से आक्रोश समझ में आता है, लेकिन तुम्हें ऐसी दुनिया में जान-बूझकर उतरकर उसी चींटी-गड्ढे में चढ़-गिर दोहराने की न ज़रूरत है, न ध्यान देने का कोई कारण।
यह बात सुनने के बाद भी अगर लगे कि कुछ कर सकते हैं, तो बस प्रार्थना करो कि संबंधित लोगों का मिशन कम कष्ट से पूरा हो और वे चेतना-विकास के महामार्ग पर आ जाएँ।

★कारण-परिणाम के नियम के बारे में
हमेशा कहता हूँ, हर घटना का वैसा प्रकट होने का कारण है और वह वास्तविक जगत में फैलने वाली नियति के रूप में चित्रित होकर प्रकट होती है।
इसलिए दूसरों से कष्ट पाने जैसा कुछ हो, तब भी घायल व्यक्ति को कभी दोष नहीं दिया जाना चाहिए। यह पिछले जन्मों के बंधन के प्रकट होकर मिटने की कोशिश का रूप भी है।
और अब जो बताने जा रहा हूँ वह आज की बात का सबसे महत्वपूर्ण सत्य है, इसलिए अच्छी तरह याद रखो: दूसरों द्वारा बुरा किए जाने की ऐसी नियति के प्रकट (चित्रित) होने के क्षण ही वह बंधन कट जाता है, साफ़ हो जाता है, पहले ही मिट चुका होता है, यही सारी नियति का सत्य है।
लेकिन तभी, जब प्रकट घटना पर अच्छे-बुरे का फ़ैसला न सुनाओ।
पृथ्वी की सतह देखो, तो ज़्यादातर लोग मिटने के लिए प्रकट हुए बंधन को मिटने नहीं देते, उसे फिर पकड़कर नया बुरा कारण बनाते हैं और अवचेतन परत में जमा कर लेते हैं।
यह सच्चाई जाने बिना जीने के कारण है, इसलिए मजबूरी कहें तो मजबूरी, लेकिन हमारे लिए ऐसे दोहराव को स्क्रीन पर करीब से देखते हुए कभी-कभी बेचैनी और छटपटाहट जैसा भाव भी होता है।
★नियति के सत्य को पहचानने के समय में
पृथ्वी के लोगों को अब नियति के सत्य को पहचान लेने का समय नहीं आ गया?
तुम्हारी दुनिया में “नियति की उफनती लहरें” शब्द है, लेकिन वह जीवन के सार को भूले भावों की आदत से बना भ्रम, माया था।
रूपक से कहें तो, असल में पानी में तैर सकते हो, लेकिन “मैं तैर नहीं सकता” मानकर हाथ-पैर मारकर, छटपटाकर डूबने-उतराने जैसी बात।
ऐसे में ढीले पड़ो तो पानी पर तैर सकते हो।
पानी पर तैर सको, तो हाथ-पैर चलाकर तैर भी सकते हो।
“तैरना असंभव है” वाले भाव के भार को अचेत रूप से महसूस करने के कारण हाथ-पैर मारते हो, भाव का भार मिटे तो हाथ-पैर मारने की ज़रूरत नहीं।
भाव के भार नाम के अनावश्यक भाव को छोड़ने के लिए, जैसा हमेशा कहता हूँ, हमेशा, हर समय गहरी साँस लेते रहने के लिए सचेत रूप से जीना बहुत महत्वपूर्ण है।
और एक बात, “दुनिया में कोई कुछ भी कहे या करे, उससे मेरी नियति प्रभावित नहीं होती!” यह जीवन-प्रकाश में जड़ जमाया महान निश्चय हमेशा बनाए रख सको, इसके लिए जीवन के फूल को बहुत सँजोकर पालो, और खुद हमेशा दिव्य क्षेत्र की चेतना में रह सको, इसके लिए चेतना के उपयोग का अभ्यास करके दिव्यता का व्यक्ति बने रहो।
बस ऐसा करते रहो, तो इस दुनिया की सारी नियति का प्रवाह कारण-परिणाम की लहर के प्रकट होकर मिटने की कोशिश के क्षणों की शृंखला है, यह सिद्धांत दिल की गहराई से समझ आता है, और किसी की आलोचना, निंदा या बेवजह मूल्यांकन करना बंद हो जाता है।
ऐसे सच्चे मानव एक, दो, तीन भी तुम्हारी दुनिया में पुनर्जीवित हों, तो पृथ्वी की नियति उतने से ही बड़ी छलाँग लगाती है और ब्रह्मांडीय युग की स्वर्णिम सभ्यता का स्वागत करने का दिन जल्दी आता है।
इसे हृदय में रखकर, किसी पर फ़ैसला न सुनाकर, बस उज्ज्वल भविष्य रचने वाली चेतना का उपयोग चौबीसों घंटे करते हुए जीओ।
क्योंकि सारी नियति ज़रूर महान सामंजस्य के महासागर में निकलकर बस बेहतर ही होगी।







