वरिष्ठजनों के आयामी उत्थान की ओर (2)
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(पिछली बार से जारी)
★व्यवस्था पर निर्भर न रहने वाले मूल्य-बोध के निर्माण की ओर
वर्तमान स्थिति बदलने की बात सुनकर, अधिकांश लोगों के मन में जो आता है, वह है देश या स्थानीय प्रशासन से वर्तमान व्यवस्था को ही बदल देने की अपेक्षा न।
“अगर सबको खुश कर सकने वाली अच्छी व्यवस्था बना दी जाए, तो हम बुज़ुर्ग हो जाएँ तब भी जीने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए” ऐसे।
लेकिन केवल व्यवस्था से सब कुछ हल नहीं होता।
ऐसी व्यवस्था है ही नहीं, यह भी कह सकते हैं।
क्योंकि कैसी भी व्यवस्था बना लो, अगर मनुष्य की चेतना न बदले, तो खुशहाल बुढ़ापा पाने वाले और न पाने वाले लोगों में बँटना, आग से भी अधिक स्पष्ट है।
समझने में आसान उदाहरण लें तो, समाजवाद या साम्यवाद जैसी व्यवस्था है न।
यह मार्क्स और एंगेल्स से शुरू हुई समानता का नारा देने वाली सामाजिक व्यवस्था है, मोटे तौर पर कहें तो, संपत्ति का साझा स्वामित्व साकार करके, कमज़ोरों की मदद करना शुरुआती इरादा था।
लेकिन उस विचार को देश की राजनीति में लागू करने वाले देशों का क्या हुआ?
भ्रष्टाचार फैल गया, जनता ग़रीबी से पीड़ित हुई, और केवल कुछ विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग मलाई खाने वाला समाज बन गया न।
आज के युग में वरिष्ठजनों की मदद सामाजिक व्यवस्था के सुधार के पहलू से करने की कोशिश करो, तो आख़िरकार समाजवादी सोच बन जाती है, और घड़ी की सुई को सौ से अधिक साल पीछे घुमाना पड़ता है।
तो अच्छी तरह सोचकर देखो।
अभी हमने कहा था न, कि अगर लोगों की चेतना न बदले, तो बाहरी परिस्थितियाँ कितनी भी पूरी तरह सँवार दो, असमानता होना आग से भी अधिक स्पष्ट है।
उस बात में हमेशा वाली बात जोड़कर देखो।
तो, उत्तर अपने आप दिखने लगा न।

★सच्चा सामाजिक-व्यवस्था परिवर्तन व्यक्ति की चेतना के विकास से
समाज को बदलने के लिए, पहले लोगों की चेतना बदलनी होगी।
उत्तर कोरिया को आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए अमेरिका कितनी भी दख़लअंदाज़ी करे, जब तक उत्तर कोरिया की जनता ख़ुद सच्चे मन से वह न चाहे, वैसा नहीं होगा।
लगभग 30 साल पहले, बर्लिन की दीवार क्यों गिरी?
क्योंकि पूर्वी जर्मनी के लोगों की चेतना जागी, और सबने स्वतंत्र रूप से जीने की इच्छा की न।
अफ़ग़ानिस्तान में विकसित कहे जाने वाले देश मदद करके, उसे चुनाव से लोकतांत्रिक ढंग से देश चला सकने वाला देश बनाने की कोशिश करते हैं, तब भी आसानी से वैसा नहीं होता, क्यों लगता है?
हाँ।
क्योंकि बाहर से केवल रूप सँवारने से, अगर वह उस देश के लोगों की अपनी दिली इच्छा से मेल न खाए, तो जड़ें जमाना कठिन होता है।
ऐसा सिद्धांत, देश जैसी बड़ी इकाई ही नहीं, हर व्यक्ति के मामले में भी, बिल्कुल वैसा ही कहा जा सकता है।
“मैं खुश होना चाहता हूँ, ज़रूर खुश होऊँगा” ऐसा दिल की गहराई से न सोच पाने तक, अपने भीतर से शक्ति उमड़ना कठिन होता है, इसलिए आगे बढ़ना आसान नहीं होता।
आसपास की मदद बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन जब उसमें अपनी शक्ति से बदलने की इच्छा जुड़ती है, तब वह सहारा सचमुच जीवंत होता है।
इसलिए मनुष्य, जब तक ख़ुद बदलने की कोशिश न करे, कुछ नहीं बदलता।
अभी जो वरिष्ठजन हैं या आगे वरिष्ठ होने वाले लोग हैं, वे मौजूदा सामाजिक व्यवस्था की परवाह किए बिना, सच्ची खुशी की ओर उन्मुख चेतना का विकास कर सकें, तो वहीं से नए युग की साँस अंकुरित होने लगेगी।
इसका अर्थ है, लोगों की चेतना बदलने से समाज का स्वरूप बदलना, यही संसार को बदलने का सही तरीका है। (अगली बार जारी)






