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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

बुज़ुर्गों के आयामी उत्थान की ओर (3)

प्रकाशित अद्यतन

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(पिछली बार से जारी)

★सच्चे स्व को स्थापित करने के लिए

बाहरी परिस्थितियों के बदलने से खुशी या दुख महसूस होना स्वाभाविक है, लेकिन वहीं ठहरे रहो, तो खुशी बाहर पर निर्भर हो जाती है।

क्यों, तो इसलिए कि ऐसी मनःस्थिति में महसूस होने वाली खुशी, फूँक मारो तो उड़ जाने वाली क्षणभंगुर खुशी होती है।

इसीलिए हम चाहते हैं कि तुम जानो कि इससे ज़्यादा अडिग खुशी भी है।

आसपास पर निर्भर, और अंततः उसके हाथों नाचने वाली खुशी के सिवा कुछ सोच न पाना, चाह न पाना, साफ़ कहूँ तो इसलिए है कि मनुष्य के रूप में “स्व की स्थापना” नहीं हुई है।

दूसरे शब्दों में कहें, तो इसका अर्थ है कि जीवन का कितना भी अनुभव जोड़ चुका व्यक्ति हो, उसके लिए भीतर के स्व को स्थापित करना एक महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर कभी भी जुटा जा सकता है।

स्व की स्थापना को मिट्टी से गुड़िया बनाने से तुलना करें, तो इसका अर्थ है कि वह अब आकार सँवारने के चरण में है।

लेकिन, लंबा जीवन जीने के कारण, बहुत से लोगों को लगता है कि वे तो सब समझ चुके हैं।

इसका क्या अर्थ है, तुम्हें क्या लगता है?

हाँ-हाँ, बिल्कुल सही पकड़ा।

पूर्वजों द्वारा बनाए गए उदाहरणों और आम समझ वाले साँचों को, बिना जाने, दोहराते हुए जी रहे हैं।

“इतनी उम्र में ऐसा व्यवहार करता होऊँगा”

“इतने साल का होने पर वैसा हो गया होऊँगा”

“उम्र बढ़ने पर शरीर जवाब देने लगता है”

“हमारे परिवार में कैंसर चलता है, इसलिए मुझे भी आगे चलकर वही होगा”

गिनने बैठो तो अंत नहीं, लेकिन ऐसी स्मृतियों के साँचों को, पता ही न चले कब, दोहराने वाले लोग बहुत हैं।

 

★बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर न रहने वाली खुशी की खोज करो

युवावस्था में ताज़गी से भरे रहे लोग भी, चालीस, पचास पार करके साठ में प्रवेश करते-करते, युवावस्था की ताज़गी को थोड़ा भूल भी जाते हैं।

ऐसे लोग भी हैं जो लड़कपन की ताज़ा संवेदनशीलता बनाए रखकर बुढ़ापे में प्रवेश कर चुके हैं, और हर कोई, किसी भी उम्र में, वह संवेदनशीलता वापस पा सकता है।

उम्र जोड़ चुके लोग युवा पीढ़ी के लिए क्या छोड़ सकते हैं, आओ साथ मिलकर सोचें।

जो लोग अभी उस उम्र में नहीं हैं, वे भी आगे चलकर उसी स्थिति में आएँगे।

कहते हैं न, “समय तीर की तरह उड़ जाता है।”

मनुष्य का एक जीवन, ब्रह्मांड की दृष्टि से, बस एक क्षण, एक पलक झपकने जितना भी मुश्किल से, थोड़े से समय की बात है।

“मेरा इससे क्या लेना-देना” न सोचकर, युवावस्था से ही अपने जीने के ढंग पर विचार करके, थोड़ा-थोड़ा दिशा सुधारते चलना अच्छा है।

मतलब, बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर न रहने वाली खुशी कैसी होती है, इसकी खोज करना।

इसे युवावस्था से ही आदत बना लो।

यही चेतना-विकास की नींव बनती है। (अगली बार जारी)

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

वीडियो जल्द आ रहे हैं

वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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