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दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

अभी मौजूद चेतना-संसाधन को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करके क्षेत्र फैलाने का तरीक़ा (उत्तरार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

(पिछली बार से जारी)

अभी मौजूद चेतना-संसाधन को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करके क्षेत्र फैलाने का तरीक़ा

तो थोड़े-से चेतना-संसाधन को प्रभावी ढंग से काम में लाकर कुशलता से चेतना का विकास करने का रहस्य, क्षण-क्षण कुछ सोचने से पहले की, मूल पूर्व-शर्त को तैयार कर देने में है।

वह है सचेत रूप से की जाने वाली गहरी साँस।

यह चेतना-संसाधन को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने का वातावरण क्यों तैयार करती है, तो इसका कारण यह है कि चेतना साँस के ज़रिए जीवन के मूल स्रोत से जुड़ी है, इसलिए गहरी साँस में उस जुड़ाव को मोटा कर देने का प्रभाव है।

गहरी साँस के आदत बनने तक कितने हफ़्ते, कितने महीने लगते हैं यह व्यक्ति पर निर्भर है, पर हार माने बिना सचेत रूप से साँस को गहरा करते रहने का अभ्यास भर करो, तो एक दिन हर किसी में, अचेतन निर्णय समेत सारे चेतना-संसाधन का इस्तेमाल पूरा का पूरा आत्म-देह या दिव्य-देह के आयाम में प्रवेश किया हुआ बन जाता है, और चेतन-अचेतन से परे, अपने भेजे विचार स्वाभाविक रूप से दिव्यता से निकलने वाले विचारों में रूपांतरित होते जाते हैं, इस मुक़ाम तक पहुँच जाता है।

इस तरीक़े की अच्छी बात यह है कि शरीर को अपना मानने वाली सतही चेतना से चेतना का विकास पूरा करने की कोशिश से अलग, अनजाने में जीवन के प्रकाश से एक होकर, जीवन-चेतना न जाने कब सतह पर गूँजने लगती है।

अपने पर विश्वास = जीवन पर विश्वास

अब तक हार ज़्यादा रही और कुछ भी पूरा न होना ज़्यादा रहा, इसका कारण यह था कि ऐसे चेतना-संसाधन के इस्तेमाल का ढंग और अपना सच्चा हृदय-स्वरूप समझ नहीं आया था, और शरीर वाला अपना उसे करने की कोशिश कर रहा था।

ऐसा नहीं, बल्कि शरीर के भीतर मौजूद “जीवन की ओर के अपने” पर खड़े होकर करो, तो कुछ पार करने की कोशिश भी, कुछ पूरा करने की कोशिश भी, सब कुछ आनंद के स्पंदन के भीतर, सकारात्मक रूप से जुटने का भाव निरंतर बना रहता है।

इसका तरीक़ा, कई बार कहता हूँ, गहरी साँस को जारी रखने में है।

बस प्राणपण से उसमें जुट जाओ, तो पहले जो कठिन लगकर पीछे हटने जैसा था, वह भी आसानी से पार करके पूरा हो जाता है, और साथ ही चेतना-संसाधन भी तेज़ी से फैलता जाता है, और “सच्चा मैं दिव्य मानवता था। अब का मैं निस्संदेह दिव्य मैं हूँ” यह अटल विश्वास-निश्चय गहराता जाता है, और एक दिन वह विचार सहज चेतना-क्षेत्र में प्रवेश कर पाता है।

अतिशयोक्ति में कहें तो, बिल्कुल सीधी-सादी बात है: “असंभव मानो तो नहीं हो सकता। पर हो सकता है मानो तो हो सकता है। ठीक है, संभव मानो तो, जितना संभव माना उतने दायरे की चीज़ ज़रूर पूरी की जा सकती है” यही बात है।

इसलिए जब विचार “यह भी नहीं, वह भी नहीं” कहते हुए दिमाग़ में आते-जाते हों और अपने जीवन-प्रकाश (अनंत क्षमता, सृजन-शक्ति) पर विशाल भरोसा बनाए न रख पा रहे हो, तब रात सोने से पहले भी समय निकालकर, घुटनों पर सीधे बैठकर, कोतोदामा की गहरी साँस लेना अच्छा है।

घुटनों पर बैठना संभव न हो, तो सीधी मुद्रा में कुर्सी पर बैठना भी चलेगा, या बिस्तर में जाकर, लोअर डांटियन के आसपास हाथ जोड़कर जीवन के प्रकाश के सामने सीधे होना भी चलेगा।

और ठीक से अच्छी गुणवत्ता की नींद लेना।

तब अगली सुबह जागने पर, सहानुभूति तंत्रिका-प्रधान मन-शरीर की स्थिति परानुकंपी तंत्रिका-प्रधान स्थिति में बदल जाती है, और जीवन-शक्ति से लबालब स्थिति में चेतना को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर पाते हो; इसलिए रोज़ की आजीविका पूरी शक्ति से निभाते हुए, अभी मौजूद चेतना-संसाधन को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करके चेतना का विकास भी साथ-साथ पूरा किया जा सकता है, ऐसा एक तीर से दो शिकार वाला जीवन-ढंग संभव है, यही बात है। (समाप्त)

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

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