आत्मिकीकरण और असेंशन के बारे में (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★हायर सेल्फ़ से एकता (कृतज्ञता) ही चेतना के विकास का मर्म है
ऐसे समय अपने पर निर्णय न देना।
“फिर कर बैठा” कहकर आत्म-घृणा या निराशा में न पड़कर, विचारों का झोंका गुज़र जाने के बाद भी चलेगा, “ऐसी विचार-आदत मुझमें अभी बची थी। प्रकट हुई, इसका मतलब इससे फिर एक और शुद्ध हुआ, साफ़ हुआ। ऐसी सब बातें भी संरक्षक आत्मा की देख-रेख में हो रही हैं, और मेरी आत्मा की सफ़ाई बन रही हैं,” ऐसा सोचकर हायर सेल्फ़ के प्रति कृतज्ञता के भाव में डूबे रहना अच्छा है।
समझते हो यह क्यों अच्छा है?

“अच्छी तरह सोचो” कभी-कभी कहता हूँ न।
यह “अच्छी तरह खुद सोचना” आख़िर क्या है, तो विचार दौड़ाने के अर्थ में तुम लोगों की सोच से अलग नहीं, पर हम जिसे सोचना कहते हैं, उसका अर्थ है एक-एक विचार को क्षण भर मन में लाकर तुरंत छोड़ देना।
यह झट-झट-झट चेतना के दृश्य बदलकर, असंबद्ध विचार छोड़कर, केवल जो ठीक लगे उस विचार को जीवन की गहराई से खींचकर चुनना और सतह पर लाना, इस कर्म को कहते हैं।
इसलिए कभी भी घुल-घुलकर सोचते रहना नहीं है।
इस जगह पर घालमेल मत करना।
तो फिर कहता हूँ, जीवन के बीच हायर सेल्फ़ के प्रति कृतज्ञ बने रहना चेतना के विकास का मर्म है।
क्यों, तो ऐसा करते रहने से अनजाने में, न जाने कब, चेतना और गहरी, और ऊँची, और चौड़ी विकसित (गहन, दिव्य) होती है, और पहाड़ की तलहटी से देखने जैसी चेतना-दृष्टि पहाड़ की चोटी या चोटी के और निकट से देखने वाली चेतना-दृष्टि में बदल जाती है, और विचारों की गुणवत्ता दिव्य हो जाती है।
केवल इतने से समझ नहीं आया?
कृतज्ञ होने का अर्थ है उस कृतज्ञता के लक्ष्य से एकाकार होना, उसके साथ एक हो जाना।
इसलिए संरक्षक देवताओं और आत्माओं के रोज़मर्रा के मार्गदर्शन-कार्य के प्रति एकनिष्ठ कृतज्ञता में समय बिताना, चेतना का अनिवार्य रूप से संरक्षक देवताओं और आत्माओं से एकाकार होते जाना है।
तर्क से बढ़कर प्रमाण, फल से जानो, इसलिए यहाँ से आगे तुम अपने अनुभव के माध्यम से देखकर महसूस करो।
क्योंकि चेतना का विकास कहो या असेंशन, वह रोज़ के अथक अभ्यास के बीच मन-शरीर में साधी जाने वाली चीज़ है। (समाप्त)






