आत्मिकीकरण और असेंशन के बारे में (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★आत्मिकीकरण और असेंशन के संबंध के बारे में
“आज की पृथ्वी में पहले ही भौतिक और मानसिक दोनों पक्षों का स्पंदन आत्मिकीकृत हो चुका है, इसलिए 20वीं सदी की तुलना में किसी के लिए भी दिव्यता प्रकट करना आसान हो गया है” जैसी बात अब तक की बातों में कही है, है न।
इस तरह की बात के बारे में लगा कि थोड़ी बात अधूरी रह गई, इसलिए आज उसकी पूरक बात बता देता हूँ।
क्या बात है, तो ऐसी बात “‘बाहरी कारक का स्पंदन (आकाश-धरती-प्रकृति) आत्मिकीकृत हुआ इसलिए असेंशन आसान हो गया’ जैसी पर-निर्भर, स्वचालित बात नहीं, बल्कि ‘आत्मिकीकृत स्पंदन-लोक की गूँज को प्रकट करने लगी तुम लोगों की सतही चेतना भीतरी आयाम के स्पंदन को अभी यहाँ (दृश्य जगत) में लागू करके पहले ही काम में ला रही है = हर किसी के लिए अपनी दिव्यता प्रकट करना आसान हो गया है’ यह बात है।”
इसलिए “तुम लोग खुद जीवन का प्रकाश प्रकट करते हो” जैसी स्व-उत्पादन की बात, यानी आंतरिक कारक (हर व्यक्ति की चेतना) के बदलाव (आत्मिकीकरण) के अनुपात की बात है, यही है।
यह इस बात का संकेत है कि तुम लोगों का मन-शरीर, सतही चेतना के अनजाने में, विभिन्न स्पंदन-लोकों की गूँज से आयाम-प्रतिच्छेदन वाला जीवन-ढंग जी पाने लगा था; और तुम लोगों के सत्य के अनुरूप रोज़ के विचार, वचन और कर्म के माध्यम से विभिन्न उच्च-आयामी स्पंदनों को भौतिक मन-शरीर में गूँजाकर, इस लोक के स्पंदन से मिलाकर, पृथ्वी-लोक के लिए सबसे उपयुक्त दिव्य-भौतिक आयाम बना रहे हो, यह भी बन रहा है।
पर यह……, यहाँ महत्वपूर्ण बिंदु है, “तो आयाम-प्रतिच्छेदन वाली चेतना अपना लूँ” या “रहस्यमय शक्ति पा लूँ” जैसे कुटिल विचार शुरू में उठा लो, तो अपनाई नहीं जा सकती, इसलिए इस बिंदु पर सावधानी ज़रूरी है।

तुम लोगों का करने का काम बस और बस, “किसी भी निर्णय के बिना वाली मनोदशा में, सत्य के अनुरूप विचार, वचन और कर्म प्रकट करते रहना” है।
क्योंकि यही दिव्य चेतना की स्थिति है।
निर्णय न करना क्या है, तो अपने और दूसरों के विचार, वचन और कर्म के बारे में “यह अच्छा” या “यह ग़लत” या “पसंद” या “नापसंद,” हर बार अच्छे-बुरे, सही-ग़लत, पसंद-नापसंद के विचार में अटककर, विचारों को मन में जमा न करना।
वास्तविक समस्या के रूप में यह कठिन लग सकता है।
क्योंकि छिपे हुए आदतन विचार अचानक सिर उठाकर, मानो सच्चे अपने हों ऐसा व्यवहार करने लगते हैं, और अपनी (अपने-दिव्य की) दिव्यता खो बैठना आसान होने वाला पहलू है।
पर असल में ऐसे समय ही बड़े चेतना-विकास का अवसर है। (अगली बार जारी)






