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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

जैसे हो वैसे अपने आप को यथार्थ जीवन-चेतना में बदलने का तरीका (पूर्वार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

★बिना बनावट की जीवन-शैली जिएँ

मनुष्य में अक्सर खुद को सँवारने, असल में वैसा न होते हुए भी वैसा दिखाने की कोशिश करने की प्रवृत्ति होती है न?

दूसरों के सामने खुद को अच्छा दिखाने की कोशिश के कुछ उदाहरण दूँ, तो “ऐसे मामले में कृतज्ञ दिखना चाहिए,” “इस दृश्य में गहरे प्रेम से व्यवहार करना चाहिए,” “इस मामले में गंभीरता से क्षमा माँगनी चाहिए” जैसी बातें।

इस तरह मन की मांसपेशियाँ तनी हुई अवस्था में रहने वाले व्यक्ति को बगल से देखो, तो जिसके स्थायी विचार बहुत श्रेष्ठ न भी हों, वह ऊपर से कुछ हद तक गहरे प्रेम वाला दिखता है, कृतज्ञ हृदय वाला दिखता है, या ठीक से क्षमा माँगता हुआ लगता है न?

अगर तुम ऐसे बनावटी विचार-कर्म में जकड़े हो, तो अच्छी तरह चबाकर देखो कि आसपास के लोगों की आँखों में धूल झोंक भी लो, अपने “सच्चे हृदय” को ही धोखा नहीं दिया जा सकता।

अगर चेतना ऐसी आत्म-वंचना की अवस्था में ठहरी रहे, तो मन के आकाश को ढकने वाले बादल धीरे-धीरे घने होते जाते हैं, और भेड़िया-लड़के की कहानी की तरह, जमा हुए झूठ खुद सहित बहुत से लोगों के काम नहीं आते, और अपना जीवन कष्टदायी बना सकते हैं।

ऐसा न हो, इसके लिए रोज़ किसी सजावट या दिखावे के बिना नग्न मन से विचार, वचन और कर्म करके, स्वाभाविक रूप से केवल अच्छी बातें सोच, बोल और कर सकने वाला व्यक्ति बनने के लिए, खुद को ठीक से मार्गदर्शन देते जाना होगा न?

इसके लिए, आरंभ के उदाहरण के उल्टे समय……, जब मन तना हुआ न हो (आराम की अचेतन अवस्था में) तब भी केवल अच्छी बातें सोचने, बोलने और कर्म में लाने का अभ्यास करना है।

मनुष्य का सोच-पैटर्न आदत से बनता है, और वह निरंतर प्रयास से बदला जा सकता है।

जब अचानक किसी बात पर आपात प्रतिक्रिया करनी हो, या बिना मानसिक तैयारी के अचानक निपटना पड़े, तब वही आदतन विचार झट से उभरकर उस व्यक्ति के वचन-कर्म-व्यवहार के रूप में प्रकट होता है।

तो, जिसे रोज़ हर बात पर खुद को झुठलाने की आदत है, उसके मन का केंद्र दिव्य क्षेत्र में नहीं है, इसलिए वह तात्कालिक, इधर-उधर भटकते वचन-कर्म करता है, झूठ से खुद को पोतता है, अपनी शक्ति से कठिन मोड़ पार नहीं कर पाता, दूसरों से द्वेष और घृणा करता है, खुद पर तरस खाता है और निराश होता है, या झूठ बोलने वाले अपने आप को किसी तरह बचाने की साज़िश करता है।

ऐसा रूप देखकर सीना दुखता है न?

ये रूप इस बात की अभिव्यक्ति हैं कि सार्वभौमिक सत्य को अपनाकर व्यक्त करने की चाल अभी आगे के चरण में है। (अगली बार जारी)

 

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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