नए साल का मार्गदर्शन और चेतना का विकास (3)
प्रकाशित अद्यतन
इसी नाम के पिछले लेख
[blogcard url=”https://hi.ascension21.com/voice-of-brothers-460/”]
[blogcard url=”https://hi.ascension21.com/voice-of-brothers-461/”]
(पिछली बार से जारी)
★सब कुछ पर विजय पाने वाली मन की शक्ति
मार्गदर्शन की बात पर लौटते हैं।
अलग-अलग देखें तो सबका अलग है, लेकिन सबके लिए साझा मार्गदर्शन का केंद्र, “शक्तिशाली व्यक्ति बनना” “सच्ची शक्ति पाना” “सच्ची शक्ति धारण करना” “शक्ति से जीना” जैसे अर्थ वाली बात है।
तुम लोग अभी, सारे कर्म पर विजय पा सकने जितनी, मन की शक्ति पाने की कोशिश कर रहे हो।
अब तक के तुम लोग, कर्म-विचारों (आदत वाली भावनाओं) में बहे भावनाओं के ढेर बन गए थे, इसलिए कुछ भी हो जाए तो तुरंत घबरा जाते, या चिंता और डर की भावनाओं से सताए जाते, और इधर-उधर भटकते, दूसरों का मुँह ताकते, वास्तविकता से भागते और ज़िम्मेदारी दूसरों पर डालते जीवन जी रहे थे।
लेकिन चेतना के विकास की ओर उन्मुख होकर जीने के परिणामस्वरूप, मन की गहराई की दिव्यता जाग उठी, और धीरे-धीरे स्मृति पर आधारित जीवन-शैली से निकलकर “जीवन जैसा है वैसा” वाला जीवन जीने का समय बढ़ता गया।
वहाँ अगले चरण के रूप में सामने आया विषय है, [सच्ची शक्ति को अपना बनाना]।
यह, जीवन के मन के रूप में ही जीने के लिए, हर किसी के न टाल सकने वाला प्रश्न है।
क्योंकि “जीवन”, किसी भी बात या चीज़ से डगमगाने वाली, कमज़ोर चीज़ नहीं।
इसलिए, अडिग मन को विकसित करते जाना, दिव्य क्षेत्र के संसार में स्थायी रूप से रहने की कुंजी बनता है।

★नए साल के मार्गदर्शन में रखा गया केंद्र
ब्रह्मांड की रचना के सिद्धांत को अपने मन-शरीर में धारण करके, स्वतंत्र रूप से सामंजस्यपूर्ण भाग्य बनाते जाने के लिए, मज़बूत आत्म-विश्वास होना चाहिए न।
आत्म-विश्वास न रखने वाला, कुछ भी करे लंबे समय तक नहीं टिकता, और सफलता के अनुभव भी नहीं जोड़ पाता।
तो इसमें महत्वपूर्ण हो जाता है, “आत्म-विश्वास क्या है?”।
शब्द से ही स्पष्ट है, अपने आप पर विश्वास करना, यहाँ तक तो स्वाभाविक रूप से सब समझते हैं, लेकिन फिर, “आख़िर ‘अपना आप’ क्या है?” इस प्रश्न के उत्तर में, हर एक के चेतना-स्तर के अनुपात में उत्तर लौटता है।
किसी भी बात या चीज़ से न डगमगाने वाले सच्चे आत्म-विश्वास को पक्का न करो, तो मनुष्य हमेशा, बेवजह संकोच करता है, या उल्टा केवल ख़ुद पर अति-विश्वास करके आसपास वालों को धकेलकर भी आत्म-साक्षात्कार में जी-जान लगा देता है।
ऐसा, ब्रह्मांड के नियम यानी महान सामंजस्य के सिद्धांत के अनुसार, सत्य से थोड़ी हटी जीवन-शैली है, इसलिए कहीं न कहीं पलटवार आता है, और जीवन-शैली पर फिर से विचार करने का अवसर आता है।
आम तौर पर कहते हैं न “उत्थान-पतन संसार की रीति है”।
अब तक के पृथ्वी के भौतिक मनुष्य, व्यक्तिगत स्व (अहं) से जीना मनुष्य का स्वाभाविक ढंग मान बैठे थे, इसलिए “कभी अच्छा समय कभी बुरा समय” जैसी, कर्म-बंधन और कारण-परिणाम के विस्तार यानी उत्थान-पतन की रीति में जीते आए।
लेकिन अगर सब ऐसी जीवन-शैली हमेशा दोहराते रहें, तो आगे पृथ्वी का भविष्य क्या होगा, यह स्वयंसिद्ध है न।
ऐसी जीवन-शैली के साथ, उज्ज्वल भविष्य बनाना कठिन है।
लेकिन अभी से जीवन-शैली बदलते जाओ तो ठीक है।
इसलिए अभी जीने वाली पृथ्वी की मानवता को, एक भी छूटे बिना, अब तक की जीवन-शैली की दिशा सुधारनी होगी।
उसका सबसे प्रमुख “दिशा का केंद्र” है, “सच्ची शक्ति को धारण करना”। (अगली बार जारी)






