सच्चा वर्तमान क्या है-3
प्रकाशित अद्यतन
परोपकार के मन को स्थायी रूप से अपने में बसाने का छोटा रास्ता
(पिछली बार से जारी) हाँ, लोगों के प्रति कृतज्ञता, दूसरों के प्रति “धन्यवाद” वाला मन।
वह है या नहीं, यही चमकता भविष्य बना पाने या न बना पाने का दोराहा बनता है।
और कहा जा सकता है कि यही परोपकार के मन को स्थायी रूप से अपने में बसाने का सबसे अच्छा छोटा रास्ता है।
अगर उस जगह तुम अपने स्वार्थ के कारण भेदभाव के विचारों में बह जाओ, तो “इस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ हो सकता हूँ, पर उस व्यक्ति के प्रति नहीं” कहकर, महान सामंजस्य से दूर विचारों की आदत से कसकर चिपकी अवस्था में होते हो।
सच में असली बन चुके परोपकार के मन वाला व्यक्ति, सामने वाला कोई भी हो, उसे सेवा करने योग्य अस्तित्व मानकर, कृतज्ञता का भाव छलकाती अवस्था में जीता है, है न।
सामने वाले के अनुसार कृतज्ञता का भाव कभी प्रकट करना और कभी न करना, कहा जा सकता है कि सच्चे वर्तमान को जीना छोड़ देना है।
आने वाली नई सभ्यता, यानी दिव्य समाज में जीने का टिकट पाने वाले सब लोग, ऐसे लोग हैं जिन्होंने सामने वाले के अनुसार भेदभाव किए बिना, सबके प्रति कृतज्ञता का भाव रखने का अभ्यास किया।
ऐसे लोगों के मन में भी शुरू में सबके भीतर द्वंद्व दिखता था।
लेकिन बिना भेदभाव के “धन्यवाद” शब्द को, स्वर-तंत्रियों को कँपाकर बोलने का अभ्यास करते-करते, सबके मन की तह से, जीवन की गहराई से ब्रह्मांड जितनी कृतज्ञता उमड़ने लगी, और वे सच्ची कृतज्ञता कर सकने वाले लोग बन गए।
यही कारण है कि कहा जाता है “कृतज्ञता प्रकाश है”।

प्रकाश से घुल-मिल चुका व्यक्ति, अपने मन-शरीर में प्रकाश उतारकर, धीरे-धीरे “ब्रह्मांड के महाजीवन के जीवन-प्रकाश की एक किरण” के रूप में अपना कर्तव्य निभाने लगता है।
यह ऐसा है मानो चुंबक से चिपकी पेपर-क्लिप या जंग लगी कील चुंबकीय शक्ति पाकर, चुंबक की भूमिका निभाने लगे। छोटे रूप में ही सही।
बिना दोहरेपन के महान सामंजस्य की ओर उन्मुख मन, शायद एक रात में स्थायी रूप से नहीं बसता, लेकिन हार माने बिना धीरे-धीरे अभ्यास जारी रखो, तो वह ज़रूर तुम्हारे लिए सामान्य बात बन जाएगा।
पृथ्वी का इतना आत्मिकीकरण हो चुका है, तो अब ऐसे अभ्यास का फल जल्दी मिलता है।
जिसने मन पक्का करके पूरा जीवन लगाकर ध्यान से ऐसा करने का संकल्प लिया, उसे देर से देर भी कुछ महीनों में ज़रूर परिणाम मिलेगा।
क्योंकि तुम्हारी नियति बनाने वाला कोई और नहीं, तुम स्वयं हो। (समाप्त)







