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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

“We”, “Our”, “Us” को स्वाभाविक मानने वाली चेतना में केंचुली बदलने के लिए-1

प्रकाशित अद्यतन

“I”, “My”, “Me” से “We”, “Our”, “Us” की ओर

“अपने आप को बनाने वाले चेतना-तत्व एकीकृत होकर सामंजस्य में आते जाते हैं, तो ‘मैं’ ‘हम’ बनता जाता है”, यह बात तुमने सुनी है न।

अभी तो पृथ्वी के 99% से अधिक लोग अपने और दूसरों को बाँटकर देखते हैं। और खुद को लेकर “एक सौ इतने सेंटीमीटर लंबा, इतने किलो वज़न वाला यह शरीर ही मैं हूँ” ऐसी भूल करते हैं, है न।

हवा के तत्वों में आत्मिकता का अंश इतना घना हो चुका है, ऐसे युग में भी, बहुत से लोग “मैं…”, “मेरा…”, “मुझे…”, “मुझसे…”, “मुझमें…” कहकर, खुद को पुकारे बिना रह नहीं पाते, ऐसे जी रहे हैं।

ऐसे ही लोग खुद की बनाई बेड़ियों वाले भाग्य में उलझकर, लोगों में बसे जीवन के सार को याद नहीं कर पाते, है न।

हम्म, उदाहरण के लिए अपने दस साल पहले, बीस साल पहले को याद करके देखो।

“मैं…”, “मेरा…”, “मुझे…” कहकर, मैं, मैं, मैं, मैं कहते रहते थे, है न।


उस समय तुम पीड़ा में डूबे थे। जिस बात की ज़िम्मेदारी तुम्हारी थी, उसका भी दोष दूसरों या समाज पर डालकर, खुद को बचाने, खुद का बचाव करने की कोशिश करते थे, है न।

इसी को कहते हैं “कुएँ का मेंढक ब्रह्मांड को नहीं जानता”।

लेकिन तुम अनगिनत पुनर्जन्मों की अवधि, और उसके सार के रूप में अब तक के कुछ दशकों के जीवन के ज़रिए, “मैं” नाम के कुएँ से निकलकर ब्रह्मांड को जानने वाली, नौसिखिए की चेतना वाले व्यक्ति तक पहुँच गए।

देखते रहो। आगे पृथ्वी की मानवता, सब लोग, “I”, “My”, “Me” वाले अहं का “We”, “Our”, “Us” वाले सच्चे स्व तक आयामी उत्थान करते जाएँगे।

मनुष्य का व्यक्तिगत स्व पतला पड़ता जाए, तो अपने लिए संबोधन बहुवचन में बदलने लगता है।

जैसे तुम्हारे साथ हुआ। (अगली बार जारी)

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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