चेतना का विकास पाए मन-शरीर को बनाए रखने का गुर
प्रकाशित अद्यतन
★चेतना को दिव्य क्षेत्र में रखने का गुर
चेतना को दिव्य क्षेत्र में रखने के गुरों में से एक है संरक्षक आत्मा के स्पंदन-लोक से एकाकार हो जाना और व्यक्तिगत स्व को फैलाकर मिटा देना।
इसका तरीक़ा कुछ भी कठिन नहीं; “संरक्षक आत्मा, धन्यवाद” यह कृतज्ञता की अभिव्यक्ति साल भर सोचते रहना।
आसान है न।
यही मन का स्वास्थ्य बनाए रखने का तरीक़ा है, और साथ ही “सब कोशिकाओ, धन्यवाद” यह शरीर के प्रति कृतज्ञता समानांतर रूप से करने से, शरीर का चयापचय भी सक्रिय होता है, और शरीर का स्वास्थ्य भी बनाए रखा जा सकता है।
ऐसा क्यों होता है, तो जब अतीत में अपने विचार दिव्यता से बहुत दूर थे, तब कोशिकाओं के लिए अपने भेजे नकारात्मक विचार निर्देश-आदेश के रूप में ग्रहण होते थे, और वे भेजे गए विचारों के अनुसार काम करती थीं।
जैसे, “थक गया,” “अब नहीं होगा,” “असंभव,” “नहीं कर सकता,” “○○ (बीमारी का नाम) तो नहीं,” ऐसे विचार भेजो तो शारीरिक कोशिकाएँ भी उन शब्दों के प्रभाव में आकर वैसी शारीरिक स्थिति की ओर आसानी से झुक जाती थीं, या मस्तिष्क की झलक को रोककर अपने को सोच-बंद स्थिति में धकेल देती थीं।
ऐसा करते आए को, “धन्यवाद” कहकर कोशिकाओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते रहो, तो वे अतीत के आदेश रीसेट करके तटस्थ स्थिति में लौटा देती हैं।
और संरक्षक आत्मा के प्रति कृतज्ञता के माध्यम से चेतना दिव्य क्षेत्र में घुसी हो, तो जीवन के प्रकाश से आने वाला सत्य में जड़ें रखने वाला अंतर्ज्ञान सतही चेतना में बहकर आता है, इसलिए “क्या ज़रूरी है” या “ज़रूरी नहीं,” “क्या करना चाहिए” या “क्या नहीं करना चाहिए,” ऐसी झलक पकड़ पाने लगते हो, और शरीर के लिए नकारात्मक विचार भेजना बंद होने के बदले केवल अनंत स्वास्थ्य सिद्ध करने वाले विचार (आदेश) ही भेजने लगते हो, इसलिए।

★दिव्य क्षेत्र की चेतना बनाए रखने के लिए
चेतना के संरक्षक आत्मा से एकाकार होने में कोई हानि नहीं, उल्टे लाभ यह है कि कर्म पैदा करने वाली अतीत की स्मृति पर आधारित, सत्य से परे अपने विचारों को जीवन के मूल की ओर से देख पाने लगते हो, और करने योग्य सही पहचान और निर्णय स्वाभाविक रूप से हो पाने लगते हैं।
यह चेतना के विकास के संकल्प में इससे बढ़कर कोई नहीं, ऐसी ताक़त कही जा सकती है।
यह बात दूसरों के शब्द चाहे जितने सुनो, पल्ले नहीं पड़ेगी, इसलिए अपने मन-शरीर से करके, सचमुच अनुभव करके देखना।
तो संरक्षक आत्मा के प्रति कृतज्ञता के विचार को आधार बनाकर समय बिताने का गुर, हमेशा कहता हूँ, गहरी साँस को सचेत रूप से जारी रखना है।
संरक्षक आत्मा के प्रति कृतज्ञता भी गहरी साँस की लय पर सवार होकर धीरे-धीरे, हृदय से करना अच्छा है।
तब केवल आत्म-चेतना से जिसकी अनुभूति कठिन थी वह दिव्य चेतना, संरक्षक आत्मा नामक बाईपास से गुज़रकर, शरीर की सतह की जाग्रत चेतना और अवचेतन के भीतरी ओर घूमकर, देवता वाले अपने, या दिव्य चेतना की ओर से आदतन अपने (जाग्रत चेतना और अवचेतन) को ऊपर से देखने की तरह देख पाने लगते हो, और सत्य के अनुरूप चेतना का संचालन आसान हो जाता है, यही बात है।
यही, दूसरे शब्दों में, चेतना का विकास (आत्मिकीकरण) पाए मन-शरीर में असेंशन (आयामी उत्थान) करके, उस स्वस्थ स्थिति को बनाए रखने का गुर है।
तो आज की बात यहीं समाप्त।







