दिव्य क्षेत्र के दृष्टिकोण को अपने भीतर धारण करने के लिए (5)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
दिव्य धारणा को चलाने का पहला चरण
अभी बताया गया ध्यान द्वारा आत्म-चिंतन ऐसे समय और परिवेश में किया जाता है जिसमें तुम अकेले आराम से अपने आप का सामना कर सको, लेकिन आधुनिक समाज में काम करते हुए जीने वाले अधिकांश लोगों के पास इतना समय बहुत नहीं होता, और अगर सब के सब ध्यान ही करते रहें तो समाज चल नहीं पाएगा।
तो अब, दैनिक जीवन में जो किया जा सकता है, काम करते हुए या परिवार के साथ समय बिताते हुए जो किया जा सकता है, उस “दिव्य धारणा को चलाने के पहले चरण” के बारे में बात करते हैं।
वह यह है कि सामान्यतः अनायास मन में गुज़रने वाले आदतन विचारों को प्रकाशमय सोच में पूरी तरह बदलने के लिए, सचेत रूप से प्रकाशमय शब्द लगातार बोलते रहना।
पहले, जब तुम किसी से बात नहीं कर रहे या सुन नहीं रहे, ऐसे समय में, गहरी साँस के साथ प्रकाशमय प्रार्थना के शब्द मन में लगातार जपते रहना अच्छा है।
और जब किसी से बातचीत कर रहे हो, ऐसे मामले में, अगर दिव्यता से बाहर का कोई विचार मन में प्रकट हो, तो तुरंत मन के भीतर उसे प्रकाशमय शब्द से ओवरराइट करके सुरक्षित कर दो और आकाश में लौटा दो।
यहाँ “आकाश” का अर्थ कहीं दूर ऊपर के गगन के पार नहीं, बल्कि अपनी चेतना की तह में स्थित जीवन के प्रकाश की चेतना है।
और दिव्य चेतना पर डटे रहने की यह साधना अकेले होने पर भी उसी तरह इस्तेमाल की जा सकती है, इसलिए जब तक चेतना शरीर में है (जब तक जागे हुए हो) इसे करना अच्छा है। (जब आसपास कोई न हो, तो मन में नहीं बल्कि आवाज़ में बोलना अधिक प्रभावी है)

ऐसा करते-करते स्वाभाविक रूप से अनायास निकलने वाले विचार प्रकाशमय विचार बनने लगते हैं, और ज़बरदस्ती ऐसा करने की कोशिश किए बिना ही, न जाने कब तुम प्रकाशमय सोच वाले व्यक्ति बन जाते हो, नियति मनचाहे से भी बेहतर चलने लगती है, और तुम ऐसा जीवन चित्रित और प्रकट कर सकते हो जिसमें खुशी के अलावा कुछ भी महसूस न हो, जो स्वयं खुशी हो।
यह किसी से कहकर करवाई गई अवस्था नहीं, बल्कि अपनी चेतना के संचालन से रची गई नियति है, इसलिए जब तक विचार दिव्य क्षेत्र से बाहर न जाए, वह खुशी कभी ढहती नहीं।
और एक बात और कही जा सकती है: वह चेतना-अवस्था, अच्छा-बुरा, खुशी-दुःख, स्वस्थ-अस्वस्थ, अमीर-गरीब जैसी द्वैतवादी चेतना-अवस्था से परे दिव्य क्षेत्र की अवस्था है, इसलिए अब तक की तरह किसी के वचन-कर्म से प्रभावित होकर बुरी भावनाएँ जगना, या इधर-उधर भटककर उलझन में पड़ना नहीं होता।
इसलिए, इस पहले चरण की चेतना-अवस्था को अपना बना लो, तो चाहे कुछ भी हो जाए, आसानी से ढह जाने वाली कमज़ोर नियति नहीं, बल्कि परम सुख के मार्ग पर चलते रह सकते हो।
उस अवस्था में रहने वाले लोग, अपने साथ कुछ भी हो जाए, कभी उसका दोष दूसरों पर नहीं डालते, इसलिए उनके भावनात्मक विचार अस्त-व्यस्त नहीं होते।
पहले, उस अवस्था की मनःस्थिति को अपना बना सको, इसके लिए खुद अपना मार्गदर्शन करो। (चेतना को सचेत रूप से चलाना)
वहाँ तक पहुँच जाओ, तो बाकी उसी का प्रयोग भर है, इसलिए अब तक की चाल से कई गुना गति से चेतना का विकास कर सकते हो। (अगली बार जारी)






