सब समस्याओं को अंतिम और अपरिवर्तनीय रूप से हल करने का रास्ता खोलने के लिए (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★सतही पृथ्वी की स्थिति के बारे में
अब तक के उत्तर कोरिया और अमेरिका के चिकन-रेस के नतीजे में, आगे पृथ्वी पर होने वाला भाग्य अभी भी एक क़दम आगे, एक क़दम पीछे की रस्साकशी में है।
तुम लोग मानवता के Divine Spark की प्रार्थना करके उनके आक्रमण-भाव और रक्षा-भाव को नरम करते हो, तो भी आज जी रही मानवता के चिंता-भय के विचार उससे बढ़ जाएँ, तो दोनों देशों के नेताओं का मन पीछे खिंचकर ज़िद्दी विचारों में जकड़ जाता है।
इस तरह केवल सतह देखो तो अभी पृथ्वी सचमुच कठिन समय से गुज़र रही है।
संघर्ष और युद्ध का संकट केवल पूर्वी एशिया में नहीं, यूरोप में भी, मध्य-पूर्व में भी, पश्चिमी एशिया में भी, अफ़्रीका महाद्वीप में भी, उत्तर-दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में भी सुलग रहा है, है न।
और प्राकृतिक आपदाओं की तैयारी भी महत्वपूर्ण विषय बन गई है, है न।
उनकी गहराई में पूरी मानवता के विचार-कर्मों के शुद्ध होते जाने की बड़ी धारा भी है, पर वह किसी एक को दोष देने के लिए नहीं है। और इसके अलावा देखो तो ओज़ोन परत का विनाश, जंगल, नदी, समुद्र, वायुमंडल का विनाश और प्रदूषण, पारिस्थितिकी-तंत्र का विनाश आदि हैं।
उनके नतीजे में मानवता के रहने के क्षेत्रों में मूल रूप से जंगल में रहने वाले जानवर और कीट घुस आते हैं, मछलियाँ कम होती जाती हैं, सब्ज़ियों-फलों की फ़सल ख़राब होती है, निश्चिंत होकर धूप नहीं ली जा सकती, सुरक्षित रूप से फ़ुरसत बिताने की जगहें कम होती जाती हैं, समुद्र-स्तर बढ़ने से ज़मीन सिकुड़ती है, जहाँ बाढ़ नहीं आनी चाहिए वहाँ बाढ़ आती है, और भी अनगिनत संकट हैं, है न।
और जीवाश्म ईंधन के ख़त्म होने से जुड़ी ऊर्जा-समस्या भी है, पूरी पृथ्वी के स्तर पर देखो तो जनसंख्या-वृद्धि से जुड़ी खाद्य-संकट की समस्या भी है, कुछ देशों में जनसंख्या-अनुपात में अति-वृद्धावस्था से श्रम-जनसंख्या की तेज़ गिरावट जैसी समस्या भी है।

केवल सतह देखो तो, एक पल भी जल्दी पूरी मानवता जीवन के सार, दिव्यता को याद करके पुनर्जीवित न करे, तो एक दिन बहुत से जीवन कष्टपूर्ण स्थिति में पड़ सकते हैं। पर ठीक है, ऐसा न हो इसके लिए रास्ता ठीक से खुला हुआ है।
सब लोग एक साथ नया युग पा सकें, इसके लिए पृथ्वी-लोक से जुड़े देवता भी और अंतरिक्ष के भाई भी, धरती के सच्चे लोगों के साथ मिलकर हर उपाय कर रहे हैं, पर अभी बहुत से लोग दिव्यता को पूरी तरह याद नहीं कर पाए हैं, इसलिए सतही विश्व-स्थिति आसानी से शांत होती नहीं दिखती।
वैसे अभी की बात में कई बार “केवल सतह” शब्द इस्तेमाल किया, है न।
यह इसलिए कि सतही दुनिया (भौतिक लोक, सूक्ष्म लोक) की गहराई देखो, तो प्रकट रूप में चाहे कितना भी दयनीय रूप हो, मानवता का सच्चा हृदय-स्वरूप न रोगी होता है न घायल, Universal God के अंश-देव के रूप में चमक बनाए रखता है; इसलिए भौतिक लोक में कैसा भी अनुभव हो, मूल रूप से कुछ भी हो जाए कोई समस्या नहीं, यह अर्थ देते हुए “केवल सतह” शब्द इस्तेमाल किया।
पर जिन पृथ्वी के लोगों ने जीवन का सार अभी पूरी तरह याद नहीं किया, उनके लिए नंगी आँख से दिखने वाली दुनिया ही सब कुछ है, और आँखों में दिखने वाली दुनिया शांत न हो तो “ईश्वर-बुद्ध हैं भी कि नहीं” सोचना, या “आख़िर नहीं होगा, असंभव, नहीं कर सकते, नामुमकिन” ऐसे नकारात्मक विचार भेजने का झुकाव होता है। (अगली बार जारी)






