“We”, “Our”, “Us” को स्वाभाविक मानने वाली चेतना में केंचुली बदलने के लिए-10
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
सच्चे अभी को जियो
अभी की बात थोड़ी और करते हैं।
वस्तु और छाया में से, खुद छाया में घुस जाने की बात की थी न।
उसके उलट, कुछ लोग खुद पूरी तरह वस्तु बनकर, छाया से घृणा करके बुरी भावनाएँ रखने लगते हैं।
सिनेमाघर में फ़िल्म देखने के उदाहरण से कहें, तो देखने वाला तुम ऊपर से देखने वाली चेतना हो, और उसे भूलकर पर्दे के भीतर घुस जाना ही, स्वयं छाया या स्वयं वस्तु बन जाना है।
सिनेमाघर में फ़िल्म देखने का उदाहरण इस अवस्था को सबसे आसानी से समझाता है, इसलिए यह बात थोड़ी और जारी रखता हूँ।
देखी जा रही फ़िल्म, पर्दे के भीतर की कहानी, दो-आयामी संसार है, है न। उसे देखने वाले तुम तीन-आयामी हो।
और वह फ़िल्म, आधे साल पहले या एक साल पहले, पता नहीं, असल में बहुत पहले ही शूटिंग पूरी होकर फ़िल्म में सहेजी जा चुकी थी, और तय रिलीज़ की तारीख़ के बाद अलग-अलग जगहों के सिनेमाघरों में देखी जा सकती है, है न।
यह उस पल को दिखाता है जब अतीत के विचार, वचन और कर्म से बना भाग्य रूप लेकर मिटने जा रहा होता है।
यही अवस्था ठीक उस पल की वास्तविकता है जिसे मनुष्य “अभी” कहते हैं।
महत्वपूर्ण बात है, इसलिए कितनी भी बार कहूँगा, मनुष्य जिसे अभी मानते हैं वह पल, वह पल है जब अतीत के विचार, वचन और कर्म से पहले ही बना भाग्य, मानो सिनेमाघर में देखी जा रही फ़िल्म की तरह, प्रकट होकर मिटता जाता है।
अभी भूकंप आया, अभी गाड़ी के नीचे आते-आते बचा, अभी प्रिय व्यक्ति ने ख़ुशी की बात कही, अभी घर लौटा।
“अभी” शब्द इस तरह इस्तेमाल होता है, लेकिन सच्चा अभी है, इस पल का अपना विचार।
और व्यापक अर्थ में कहें, तो अभी क्या सोच रहे हो, क्या कह रहे हो, कैसे कर्म कर रहे हो।
यही सच्चा अभी है, और कहा जा सकता है कि यही भविष्य के भाग्य को रचने वाले काल-स्थान में जीना है।
क्या हुआ, यह सब तो बस अतीत है।

“We”, “Our”, “Us” को स्वाभाविक मानने वाली चेतना आत्मसात करने का समय आ गया है
तो, यह समझ आ गया कि सात मन मिलकर एक आत्मा बनी है।
यह भी समझ आ गया कि परोपकारी मन को अपना बनाने की सही घड़ी आ गई है।
यह भी समझ आ गया कि अपने और अपने बीच के संबंध में सामंजस्य लाना ज़रूरी है।
यह भी समझ आ गया कि संसार को हर एक की चेतना रचती है।
यह भी समझ आ गया कि दूसरों के प्रति महसूस होने वाले विचार अपने ही मन का रूप हैं।
यह भी समझ आ गया कि अपने भीतर तरह-तरह के दो ध्रुवों वाले विचार थे।
यह भी समझ आ गया कि उन्हें ऊपर से देखने वाली स्थिति पर खड़े होना ज़रूरी है।
यह भी समझ आ गया कि सच्चा अभी क्या है।
तो अब जाकर बिल्कुल शुरू में कही गई बात में प्रवेश कर सकते हैं, “अपने आप को बनाने वाले चेतना-तत्व एकीकृत होकर सामंजस्य में आते जाते हैं, तो ‘I’, ‘My’, ‘Me’ से ‘We’, ‘Our’, ‘Us’ की चेतना में रूपांतरण होता जाता है”।
अभी बताए चरणों से होकर चेतना का विकास करते जाओ, तो जिन्हें तुम दूसरे मानते थे, वे असल में “तुम” नाम के ग्रह के निवासी थे, यह धुँधला-सा ही सही, दिखने लगा होगा, है न।
ब्रह्मांड घटनाओं के संसार में भी फैला है, लेकिन उसका असली रूप मन की गहराई में था।
इसीलिए भीतर के ब्रह्मांड की मानवता को मेल से जीना चाहिए।
सरल शब्दों में, अपनी दिव्यता को स्वाभाविक रूप से देखो, और खुद से मेल रखो।
बस यह कर सको, तो अपने लिए संबोधन “हम” बन जाता है।
मानवता का हर व्यक्ति अपने और दूसरों में भेद न करने वाला मन रखे, यही पृथ्वी को सचमुच शांतिपूर्ण ग्रह बनाने की प्रेरक शक्ति है।
कृपया इस बोध को अपना बनाकर, अपने और दूसरों को, पृथ्वी-संसार को देखो।
ऐसा करो, तो अभी से कहीं अधिक लोग चेतना के विकास की ओर उन्मुख होंगे, और आगे चलकर एक-एक करके तुम लोगों के साथी बढ़ते जाएँगे। (समाप्त)






