सब समस्याओं को अंतिम और अपरिवर्तनीय रूप से हल करने का रास्ता खोलने के लिए (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★ब्रह्मांडीय विज्ञान ही अंततः पृथ्वी को पूर्ण करने वाली शक्ति है
उस समय पहली बार यह सत्य पूरी मानवता को पहचान में आएगा कि मानवता का हर एक व्यक्ति ईश्वर का ही अस्तित्व था, मानवता के आपसी वैमनस्य पृथ्वी से साफ़ हो जाएँगे, और पुरानी सभ्यता के युग का अंत घोषित होगा।
उसके बाद ही ब्रह्मांड की वैज्ञानिक शक्ति पूरी तरह पृथ्वी पर लाई जाएगी।
सच्चा सत्य है इसलिए कई बार कहता हूँ, ब्रह्मांडीय विज्ञान ही अंततः पृथ्वी को पूर्ण करने वाली शक्ति है, इसके लिए आयाम का उत्थान (आत्मिकीकरण) ज़रूरी है, भौतिक लोक का आयाम ऊपर उठाने की शक्ति ही मानवता की चेतना का विकास है, पूरी मानवता की चेतना के विकास के लिए रास्ता खोलने की भूमिका वाले लोग ज़रूरी हैं, और रास्ता खोलने वाले चेतना-विकास के अग्रिम दल के लोगों को, मानवता से आगे बढ़कर चेतना विकसित करने के लिए प्रार्थना को मूल बनाकर तरह-तरह की साधनाएँ ज़रूरी हैं, यही बात है।
क्योंकि दलदली कीचड़ के खेत में छाती या गर्दन तक कीचड़ में धँसते हुए आगे बढ़ने के लिए जीवन का प्रकाश बाहर लाए बिना, केवल शरीर की शक्ति से किसी भी तरह आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
इसलिए हम भी तुम लोगों के हायर सेल्फ़ के साथ मिलकर तुम लोगों का सहयोग कर रहे हैं, यही बात है।
ब्रह्मांड का विज्ञान, मानवता तीव्र अस्वीकार-प्रतिक्रिया न करे इसके लिए, थोड़ा-थोड़ा करके आज के युग में भी बहाया जा रहा है।
वैज्ञानिक आविष्कार करने वाले लोगों की चेतना विकसित न हो तो उसका प्रकाश बहाया नहीं जा सकता, इसलिए धीरे-धीरे ही सही, स्पंदन-समायोजन आगे बढ़ाते हुए वैज्ञानिकों का चेतना-सुधार चुपचाप आगे बढ़ाया जा रहा है, पर विनाश के विज्ञान या द्वैत के टकराव के विज्ञान से अलग प्रज्ञा के उनके दिमाग़ में पूरी तरह कौंधने में थोड़ा और समय लगेगा।
“क्या, अभी नहीं?” ऐसा मत सोचना।

जैसा अभी कहा, देवताओं और अंतरिक्ष के भाइयों के भौतिकीकरण की घटना के समय से गुज़रकर, एक दिन पूरी पृथ्वी की मानवता का चेतना-सुधार पूरा होने तक कुछ समय लगेगा, पर वह समय ज़रूर आएगा, और तब जीवों और पृथ्वी के पर्यावरण पर बुरा असर डालने वाली कल्पना वैज्ञानिकों के दिमाग़ में उठनी बंद हो जाएगी, और सब कुछ को जीवंत करने वाली प्रज्ञा वैज्ञानिकों के माध्यम से आविष्कार-खोज के बाद लागू होने का समय आएगा, इसलिए निराशावादी होने की ज़रा भी ज़रूरत नहीं।
चाहे कैसी भी बीच की प्रक्रिया से गुज़रे, पृथ्वी ज़रूर सामंजस्यपूर्ण तारा बनेगी।
ब्रह्मांडीय आकाश में बिखरे हर तारे का इतिहास ब्रह्मांड को रचने वाली मूल चेतना की हथेली पर है, और अंत में सब कुछ ज़रूर अच्छा हो, ऐसा डिज़ाइन और तय किया गया है।
यह निस्संदेह तथ्य है, इसलिए कृपया हमारे शब्दों पर विश्वास करो।
ब्रह्मांड की प्रज्ञा के ही सामंजस्य-विज्ञान को पृथ्वी पर उतारा जा सके, तो खुद प्रार्थना करने का मन न करने वाले लोग भी, चाहे कितनी भी भारी ग़लती कर चुके लोग भी, रास्ता खो चुके राष्ट्र-नेता और धार्मिक नेता भी, एक दिन स्वीकार करेंगे कि उनका सार ईश्वर ही था, और सामंजस्यपूर्ण मूल व्यक्तित्व (दिव्यता) फिर से पा लेंगे।
इस तरह सब लोगों की आत्म-रक्षा की भावना भी एक दिन जीवन के प्रकाश से शुद्ध होगी, और हर कोई दिव्य मानवता के रूप में जीते-जी नया जन्म लेने का “पुनर्जीवन” अनुभव करेगा।
उस समय के आगमन को जल्दी या देर करना, सब तुम लोगों पर निर्भर है।
पर इसका मतलब यह नहीं कि ज़बरदस्ती कंधे तानकर ज़ोर लगाने की ज़रूरत है।
मानवता से आगे बढ़कर पहले ही ब्रह्मांडीय नियम पर सवार तुम लोगों का भाग्य निश्चित रूप से सब कुछ अच्छा हो ऐसे चलाया जाना है, इसलिए जो करना है वह न चाहते हुए भी हो जाता है, और जो नहीं करना उसे स्वाभाविक रूप से न करने की स्थिति में ले जाया जाता है।
ऐसा बनने के लिए, दिमाग़ (सोच) का इस्तेमाल न करना है।
विचार न दौड़ाकर, मन की गहराई की झलक के प्रति सरल होकर, प्रथम अंतर्ज्ञान के अनुसार जीते रहो, तो ज़रूर सब कुछ अच्छी तरह चलता जाता है।
इसके लिए हर समय की गहरी साँस किसी भी चीज़ से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।
तुम लोग इस पर विशाल विश्वास रख सकते हो।
क्योंकि पृथ्वी को सामंजस्यपूर्ण तारे के रूप में पुनर्जीवित करने की बहुमूल्य वस्तु तुम लोग तिहरे, पाँच-गुने, सात-गुने प्रकाश में लिपटे और रक्षित हो, तुम्हारा रास्ता रोकने वाली हर चीज़ मिटाकर शुद्ध की जाएगी, हर जगह (देश, स्थिति, वातावरण) में रास्ता खुलेगा, और उस रास्ते पर पूरी मानवता चलकर आएगी। (समाप्त)






