बाहरी परिस्थितियों से न डगमगाने वाली चेतना को मानक बनाएँ-2
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
पीड़ा के कारण की सच्चाई खोजकर उसे मुक्त करो
आज का युग, ऐसा समय है जिसमें यह पूरी तरह खोजकर स्पष्ट करना आसान है कि ऐसी “कुछ न हो सकने जैसी लगने वाली स्थिति” में जीने को मजबूर लोग अब भी इतने अधिक क्यों हैं।
क्योंकि भौतिक स्पंदन भी मानसिक स्पंदन भी बीस या तीस साल पहले की तुलना में, बेहिसाब सूक्ष्म होकर आत्मिक हो चुके हैं।
अस्तित्व के स्पंदन का सूक्ष्म होना, इसका अर्थ है सार के और क़रीब पहुँचना।
इसलिए छिपे तथ्य और उनके भीतर के सत्य को स्पष्ट करना आसान है।
इसके बाद उत्तर बताएँगे, इसलिए “कुछ न हो सकने जैसी लगने वाली स्थिति” में जीने को मजबूर लोग इतने अधिक क्यों हैं, इसका कारण सोचकर देखो।
……।
उसका उत्तर है, पृथ्वी पर पुनर्जन्म दोहराते आए लंबे समय में, “मनुष्य अपना संसार अपनी पहचान से रचता है” यह बुनियादी पहचान भूल जाना।
यही सब कुछ की शुरुआत, मूल कारण है।
देश का ही अजीब दिशा में चले जाने जैसी बड़ी समस्या भी, बात के सार तक खोजते जाओ तो, “हर एक के मन का ढंग सत्य को भूलकर भटकी विचार-आदतों में ही लगा रहा” इस तथ्य से टकराते हो।
हम जिसे सच्चाई की खोज कहते हैं, वह केवल “बाहर कारण ढूँढ़ना” नहीं, बल्कि हर एक का अपने मन के भीतर सच्चा कारण खोजकर उसे मुक्त करना है।

आत्म-केंद्रित विचार-आदतों को परोपकारी सोच पर आधारित दिव्य आदतों में बदलो
जितना याद है उतना ही सही, स्मृति को टटोलकर याद करके देखो।
तुम्हें जो कठिन लगा, दुखी किया, पीड़ा दी, बुरा लगा, स्वीकार करना कठिन लगा…।
सब, बाहरी परिस्थितियों पर भावनात्मक विचारों के प्रतिक्रिया करने से [बाहर के प्रति बचाव की प्रतिक्रिया कर बैठने का परिणाम] है न।
जब तुम ख़ुश हुए, मज़ा आया, सुविधाजनक स्थिति बनी…।
ऐसे समय, बिना शर्त स्वागत वाली भावना में मन नाच उठा, और दिल की गहराई से कृतज्ञता नहीं कर पाए न।
यहाँ तक देखा तो ध्यान गया होगा।
भौतिक शरीर से चिपकी पुरानी भावनाएँ, सब अपनी सुविधा पर आधारित अहं को आरंभ-बिंदु बनाकर निकली थीं।
चेतना का विकास करना, असेंशन (आयामी उत्थान) करना, ऐसी “आत्म-केंद्रित विचार-आदतों” को “परोपकारी सोच पर आधारित दिव्यता” को आरंभ-बिंदु बनाकर निकलने के लिए उन पर नया लिखकर सहेजते जाना है।
ऐसा करते जाओ तो, अपनी सारी स्मृतियाँ अनजाने में शुद्ध हो चुकी होती हैं, और पता भी नहीं चलता कि कब किसी बात या चीज़ में न बँधने वाली मनःस्थिति बन गई।
स्मृति, कंप्यूटर या मोबाइल फ़ोन की हार्ड डिस्क से बहुत मिलती-जुलती कही जा सकती है।
इसलिए मस्तिष्क की कोशिकाओं पर दिव्यता पर आधारित प्रकाश की सोच से नया लिखकर सहेजते जाओ, तो अब तक न रहे नए सिनैप्स के जुड़ाव बनते हैं, और दिव्यता पर आधारित सोच-ढर्रे से विचार, वचन और व्यवहार करना अपने लिए स्वाभाविक हो जाता है।
वहाँ तक पहुँचने में कुछ महीने लग सकते हैं, लेकिन “धीमी, शांत श्वास और एकनिष्ठ कृतज्ञता वाला जीवन” धीरे-धीरे लगातार जारी रखो, तो विचार-आदतें निश्चित रूप से फिर से रंग दी जाती हैं।
बाहरी परिस्थितियों से न डगमगाने वाली चेतना को मानक बनाना, अब किसी के लिए भी कल्पना या सपनों की कहानी नहीं है।
मूल रूप से भीतर निहित सत्य के क़रीब जाकर उसे प्रकट करने वाला रोज़ का जीवन जीते रहो, तो तुम इसी साल के भीतर सच्चे स्व को जीने वाले व्यक्ति में बदल चुके होगे।
(समाप्त)







