सच्ची शक्ति (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★जड़ में बैठा मृत्यु का भय
पृथ्वी के लोग जानते हैं या नहीं, यह अलग बात है, पर अतीत की मानव-दृष्टि में जकड़े हुए सब लोग, एक-एक करके सब, शरीर के जीवन से चिपके हुए हैं और चेतन या अचेतन रूप से मृत्यु से डरते हैं।
इसका प्रमाण यह है कि सबके मन की जड़ में मृत्यु का भय होने के कारण ही वे एक-दूसरे से अपनी रक्षा करने या दूसरों पर हमला करने जैसे विचार, वचन और कर्म में छटपटा रहे हैं, है न।
पर मृत्यु मूल रूप से एक ऐसी घटना है जिससे ज़रा भी डरने की ज़रूरत नहीं।
क्योंकि मनुष्य केवल शरीर वाला अस्तित्व नहीं है।
शरीर के अलावा कई परतों की देह पहने हुए, विभिन्न देवलोकों में भी एक साथ मौजूद होना, यही मनुष्य के जीवन का सत्य है।
यह मरने पर समझ आता है, पर “मरो तो समझ आएगा” कहने पर भी, जब तक मिशन है तब तक मरा नहीं जा सकता, इसलिए यह मानने के सिवा कोई रास्ता नहीं कि ऐसा ही है।
पर यह बात निस्संदेह एक तथ्य है।
दिव्यता प्रकट करके जीने वाला व्यक्ति जीवन के इस तथ्य को, जैसे आईने में देखकर अपना रूप पहचान लिया जाता है, वैसे ही सहज बात के रूप में जानता है, इसलिए उसमें मृत्यु से डरने का भाव उठता ही नहीं।
ग़लतफ़हमी हो तो मुश्किल होगी, इसलिए जान-बूझकर कह रहा हूँ: “जो होना है हो” वाली हताश मनोदशा से मृत्यु से न डरना, या “बम लेकर मरूँ तो स्वर्ग जाऊँगा” वाली सोच की पृष्ठभूमि में मृत्यु से न डरना, इससे बिल्कुल अलग बात है।
इन सावधानियों को ध्यान में रखकर, यह सत्य जानने के बाद कि मनुष्य का जीवन जीते-जी ही विभिन्न देवलोकों में भी एक साथ वास्तविक रूप में जी रहा है, जिस व्यक्ति का मृत्यु का भय मिट गया, उसके मन में ग़ैर-ज़रूरी बहिष्कार की सोच या आक्रामक सोच बिल्कुल नहीं उभरती।
अगर ऐसे व्यक्ति के सामने कोई खड़ा भी हो जाए, तो आक्रामक विचार बस उस व्यक्ति के अपने पास लौट जाते हैं, और दिव्य मनुष्य को चोट या पीड़ा नहीं होती।
यह “सच्ची शक्ति” की वह स्थिति है जो ऐकिदो के मर्म से भी मेल खाती है।

★आने वाले युग में ज़रूरी शक्ति
आने वाले युग में ज़रूरी शक्ति न दुनियादारी की चतुराई है, न विद्या-बल, न बाहुबल, न सैन्यबल।
अभी कहा गया दिव्यता को अभिव्यक्त करके जीना, दूसरे शब्दों में, आत्मा की शक्ति को प्रकट करके जीना ही वह शक्ति है जिसकी सबसे अपेक्षा है।
वह शक्ति सारे अँधेरे विचारों पर जीवन का प्रकाश डाल रही है।
जहाँ यह जीवन का प्रकाश डाला जाता है, वहाँ जैसे सूर्य का प्रकाश अँधेरे में चमक उठे, वैसे ही सारी स्थिति स्पष्ट हो जाती है, और रास्ता भटके हुए लोग भी विवेकपूर्ण निर्णय-शक्ति फिर से पाने लगते हैं।
★वर्तमान को जीवंत करने वाला जीवन-ढंग
तुम लोग, जिन्होंने अपनी मूल आत्मिकता और दिव्यता को याद कर लिया है, पृथ्वी को देखने वाले सब उच्च-आयामी अस्तित्वों की ओर से विशेष रूप से संरक्षित हो, इसलिए तुम लोगों को अपने जीवन की चिंता करने और परेशान होने की ज़रा भी ज़रूरत नहीं।
तुम लोग अब उस चरण में आ चुके हो जहाँ व्यक्तिगत बातों की कामना किए बिना भी सब कुछ पूरा हो जाता है, इसलिए ज़रूरी चीज़ें ज़रूरत के अनुसार प्रकट होती हैं और तुम बिना किसी अभाव के जी सकते हो।
बशर्ते अतीत की आदत से छटपटाओ नहीं।
तुम लोग, जब मानवता का बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति को इच्छा-शक्ति से खींचने की कोशिश में लगा है, ऐसे विरले लोग हो जो अपनी सुविधा को फ़िलहाल एक ओर रखकर समष्टि की खुशी की प्रार्थना कर सकते हो।
तुम लोग उस अतीत की दुनिया से निकल चुके हो जिसमें व्यक्तिगत कामनाओं को “प्रार्थना” माना जाता था, और याद कर चुके हो कि समष्टि के सामंजस्य को उभारने वाली चेतना की अभिव्यक्ति ही सच्ची “प्रार्थना” है।
इसलिए तुम लोग पृथ्वी-जगत में “निधि”, “बहुमूल्य वस्तु” के रूप में, तुम लोगों की भाषा में कहें तो स्वर्ग के देवताओं और देवदूतों द्वारा सँभालकर रक्षित और मार्गदर्शित हो।
इसलिए तुम लोग निश्चिंत होकर अपनी सुविधा को छोड़कर, पृथ्वी की मानवता की चेतना के विकास और सत्य के प्रति जागरण की, अभी बस एकाग्र होकर प्रार्थना करते रहो।
क्योंकि अभी सबसे महत्वपूर्ण समय है।
बस ऐसा करते रहो, तो पृथ्वी के आत्मिकीकरण को बढ़ावा देना सरल हो जाएगा और अगले चरण की ओर बढ़ा जा सकेगा।
दूसरे शब्दों में, इस तरह वर्तमान को जीवंत करके जीने वाले लोग एक-दो करके जितने बढ़ेंगे, पृथ्वी-जगत का पूर्ण प्रभात उतना ही निकट आएगा।






