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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

महान सामंजस्य वाले संसार की पूर्णता की ओर (पूर्वार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

★महान सामंजस्य वाला संसार बनाने के लिए

बस मेरा भला हो, बस मेरे परिवार का भला हो, बस मेरे संगठन का भला हो, बस मेरे रहने वाले स्थानीय क्षेत्र का भला हो, बस मेरे देश का भला हो, बस मेरी जाति का भला हो……।

जीवन के सार यानी दिव्यता की ओर देखने वाले लोग बढ़ रहे हैं, पर दूसरी ओर, ऐसी आत्म-केंद्रित सोच वाले लोग भी बढ़ रहे हैं न।

उनके इस रूप को, संसार के बँटवारे और टकराव को बढ़ावा देने वाली शक्ति मानकर, पृथ्वी के भविष्य की चिंता करने वाले लोग भी हैं, लेकिन एकत्व से उल्टी दिशा में जाने वाले इस ढंग को आयामों से परे ब्रह्मांड से देखें, तो छिपा हुआ पहलू भी दिखता है।

वह यह है कि आज पृथ्वी-संसार में सतह पर आ रहा अति-व्यक्तिवाद (आत्म-केंद्रितता) का उदय, और विभिन्न देशों, जातियों, धर्मों आदि का बँटवारा और टकराव, पूरी पृथ्वी के एक राष्ट्र बनकर ब्रह्मांड के तारों के साथ संवाद करने वाले युग के आने से पहले, दिव्यता को नकारने वाले कर्म-विचारों की आख़िरी पलटवार वाली लहर का रूप है।

उसके मूल कारण की बात करें तो, यह लोभ न छोड़ पा रहे उस लोक के लोगों की भावनाओं का, भौतिक लोक के लोगों की भावनाओं के साथ गूँजकर, सतह पर प्रकट होने वाला रूप भी है।

लेकिन सबसे क़रीब के उस लोक और इस लोक में रहकर समाज को अशांत कर रहे वे लोग भी, पुराने सभ्यता-संसार (आज के संसार) के समाप्त होने के बिल्कुल आख़िरी क्षण में, अपने जीवन की दिव्यता (सार) का बोध पाकर दिल की गहराई से हृदय-परिवर्तन करने का समय आएगा, इसलिए तुम लोग आगे, कोई कुछ भी करे और कैसी भी घटना हो, कैसा भी असामंजस्य दिखे, बिना किसी भी चिंता या डर या टकराव वाली पहचान के (व्यर्थ में शत्रुता भड़काए जाने के बिना), बस चुपचाप पूरी मानवता के मूल स्वभाव यानी दिव्यता के प्रकट होने पर ही विश्वास करते हुए उसे निहारो, और केवल यही पहचानते रहो कि पूरी मानवता दिव्य अस्तित्व है, इतना काफ़ी है।

क्योंकि पृथ्वी के असेंशन (आयामी उत्थान) को आगे बढ़ाने वाले पक्ष में खड़े तुम लोग, उनसे प्रभावित होकर नकारात्मक विचार, वचन और कर्म बिखेरने लगो, यही उनकी मनचाही बात है, उनके जाल में फँसना है।

तो, पूरे पृथ्वी-संसार के महान सामंजस्य वाले युग तक पहुँचने के लिए, आत्मिक होते जा रहे भौतिक स्पंदन के सूक्ष्म होने के साथ-साथ, मानवता की चेतना को भी सूक्ष्म होना होगा।

सूक्ष्म होने को दूसरे शब्दों में कहें तो, आत्मिक होना है, दिव्य होना है।

चेतना सूक्ष्म हो जाए तो मनुष्य का मन कैसा हो जाता है, समझते हो?

उसमें सब कुछ के प्रति दूसरों का ख़याल बिना चूक के पूर्ण हो जाता है, सब कुछ को जीवित करने वाला ज्ञान बिना रुकावट के मन की गहराई से उमड़ता है, और सोचना, कहना और करना, सब सामंजस्यपूर्ण हो जाता है।

सब ऐसे हो जाएँ, वही संसार अडिग शांति स्थापित महान सामंजस्य वाला संसार है।

तुम लोगों के मन में हर क्षण कौंधने वाले विचार, और उन पर आधारित हर एक हरकत…… यानी वचन और व्यवहार।

यही महान सामंजस्य वाला संसार बनाने की नींव है, इसलिए गिरकर कीचड़ में सन जाओ तो भी कोई बात नहीं, रेंगकर भी, लुढ़ककर भी, आगे की ओर देखने वाली चेतना बनाए रखने से हार माने बिना बढ़ते रहो।

“अरे, नकारात्मक विचार बहा दिए” ऐसा समय आ भी जाए, तो उससे जोड़ी हुई चीज़ ढह नहीं जाती, और न ही तुम आए हुए रास्ते पर वापस लौटते हो, इसलिए निश्चिंत रहो।

बस, ऐसे समय तुरंत उसी क्षण, प्रकाश के शब्दों, दिव्यता के शब्दों से, छोड़े गए नकारात्मक विचारों को मिटा दो तो हिसाब साफ़ (उस प्रतिक्रिया का कर्म मिटी हुई अवस्था) हो जाता है, इसलिए रोज़ के जीवन में ज़रूर करके देखना। (अगली बार जारी)

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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