चेतना के सचेत उपयोग के बारे में (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★सबको बराबर मिली जीवन-शक्ति का उपयोग कैसे करें
हर किसी पर बराबर बरसने वाला जीवन का प्रकाश……।
“जीवन की शक्ति”, “जीवन-शक्ति” कहूँ तो ज़्यादा आसानी से समझ में आएगा क्या?
उसी जीवन-शक्ति से हर कोई अपना मन और भौतिक शरीर चला रहा है।
और, उस जीवन की शक्ति को कैसे बाँटकर उपयोग करें, कैसे काम में लाएँ, इसे तय करने का अधिकार और चलाने का सामर्थ्य हर एक भौतिक मनुष्य को सौंपा गया है।
उसे द्वेष और ईर्ष्या में लगाना भी स्वतंत्र है।
गुस्से और नफ़रत में लगाना भी स्वतंत्र है।
दुख और नकारात्मक सोच में लगाना भी स्वतंत्र है।
यूँ ही आदत में बहकर लगाना भी स्वतंत्र है।
सचेत होकर अनुशासन के साथ लगाना भी स्वतंत्र है।
केवल प्रेम को प्रकट करने में लगाना भी स्वतंत्र है।
अपने को निखारने और ऊँचा उठाने में लगाना भी स्वतंत्र है।
कैसे भी उपयोग करो, उसमें दखल देने का अधिकार या बदलाव थोपने का सामर्थ्य किसी के पास नहीं है।
सच में नहीं है।
अपनी चेतना के सिवा।
उस व्यक्ति का हायर सेल्फ़, संरक्षक देवता और आत्माएँ भी, व्यक्ति की चेतना के विवेक की स्वतंत्रता में बिल्कुल दखल नहीं देते।
क्योंकि वह, कहो तो, ब्रह्मांड के नियम जैसा है।
इसलिए, अपनी चेतना का उपयोग कैसे करना है, यह तुम पर ही छोड़ा गया है।
उस अपनी ज़िम्मेदारी वाली जीवन-ऊर्जा के उपयोग को चलाने वाला है उस व्यक्ति का मन, चेतना, विचार, भाव।
उन्हें मोटे तौर पर बाँटो, तो वे जाग्रत मन और अवचेतन, दो में बँटते हैं।
और, जाग्रत मन भौतिक शरीर के आयाम में है, और अवचेतन सूक्ष्म देह के आयाम में है, यह भी मैंने पहले बताया था न।

★चेतना के उपयोग का अंतर ही असमानता का कारण था
यही “चेतना चलाने के ढंग का अंतर”, दूसरे शब्दों में “हर व्यक्ति के चेतना के उपयोग के ढंग का अंतर” ही, लोगों की नियति को इतना अलग-अलग, ज़मीन-आसमान जितना भिन्न बनाता है।
भौतिक शरीर की उथली चेतना से ही इस संसार को ऊपर से देखो, तो लगता है न, “यह संसार कितना असमान है।”
उसकी गहराई में चेतना के उपयोग के अंतर का भी बड़ा हाथ है।
इसलिए तुम लोगों के संसार के ढंग को सच्चे सत्य की दृष्टि से देखें, तो कहा जा सकता है कि हर किसी पर बराबर जीवन का प्रकाश बरस रहा है।
“चेतना का उपयोग कहने से क्या, वह तो बहुत धुँधली बात है, समझ नहीं आती”, ऐसा लग सकता है, लेकिन साँस को गहरा करके चेतना को आत्मा की गहराई में स्थिर करके देखो, तो मानो चित्र-पट्टिका देख रहे हो, वैसे अपनी चेतना चलाने के ढंग को हाथ पर रखी चीज़ की तरह साफ़ देख पाने लगते हो।
अरे, आज के युग में चित्र-पट्टिका नहीं, “मानो वीडियो देख रहे हो” कहना ज़्यादा आसानी से समझ आएगा।
मतलब, अपने को तटस्थ होकर ऊपर से देख पाने लगते हो।
ऐसा होने पर ही पहली बार समझ आने लगता है, “अच्छा, मेरे विचारों की ऐसी आदत थी। ऐसी बँधी-बँधाई प्रवृत्ति थी।”
लेकिन केवल इतने से सच्चे स्व को जानना नहीं हो जाता।
क्योंकि वह बस बहुत-बहुत उथली, भौतिक शरीर से चिपकी विचारों की प्रवृत्ति को जानना भर है।
फिर भी वहाँ तक पहुँचने में भी, कई दसियों हज़ार या लाखों वर्षों का पुनर्जन्म पार करना, साधारण स्तर के भौतिक मनुष्य के लिए सामान्य है।
और, तुम लोगों के संसार में, कष्ट और दुख जितने ज़्यादा हों, उतना ही व्यक्ति बड़े दिल वाला और अपने व दूसरों के प्रति कोमल बन पाता है, है न।
इसलिए पिछले जन्मों से आज तक के तरह-तरह के भटकाव और कष्ट के अनुभव, कभी भी बेकार का घुमावदार रास्ता नहीं थे, बल्कि न छोड़ी जा सकने वाली, बिल्कुल ज़रूरी प्रक्रिया थे। (अगली बार जारी)






