पृथ्वी की शांति और आत्मिक स्तर का उत्थान (7/7)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
पृथ्वी-संसार को पूर्णता की ओर ले जाने वाला तुम्हारा महान कार्य
मैं हमेशा कहता हूँ, हम तुम्हारे मन के भीतर काम कर रहे हैं।
जब तक पृथ्वी-लोक एक निश्चित आत्मिकीकरण पूरा नहीं कर लेता, तब तक हम केवल तुम्हारे माध्यम से ही पृथ्वी की शांति का समर्थन कर सकते हैं।
हम तुम्हारे उस आत्मिकीकृत बहुमूल्य हाकु-तत्व (शरीर को बनाने वाले मूल तत्व) को रक्तदान की तरह निकालकर पृथ्वी की समस्त मानवता में बाँटते हैं, और उसके बदले में तुम्हारी संरक्षक आत्माओं और संरक्षक देवताओं की सहायता करके, ताकि तुम अधिक स्वस्थ नियति का सृजन कर सको, अनंत ब्रह्मांडीय जीवन-ऊर्जा उँडेल रहे हैं।
इससे तुम्हारी आत्मा रोज़ फैल रही है और आत्मिक स्तर स्वाभाविक रूप से ऊपर उठ रहा है।
इस वर्ष के शुरू होने के बाद के कुछ महीनों में, तुममें से आधे से अधिक लोगों की मनःस्थिति बहुत गहरी हुई है।
इसका अर्थ है कि आत्मा की चौड़ाई बढ़ी और हर एक का आत्मिक स्तर ऊपर उठा (गहरा हुआ)।
दूसरे शब्दों में, आत्मा की शक्ति बनी।
ऐसा होने पर क्या होता है, तो तुम्हारी व्यक्तिगत बातों की कहें, तो अपनी सुविधा के बारे में कुछ भी सोचने-चिंता करने का मौका मिले बिना ही सब बेहतर हो जाता है, इसलिए खुशी और कृतज्ञता के अलावा चेतना का फ़ोकस कहीं और नहीं जमता।
और बाहरी दृष्टि से, पृथ्वी-संसार को किसी तरह पूर्णता की ओर ले जाने की कोशिश करने वाले देवताओं और आत्मिक लोगों की क्रिया, और हमारे जैसे तुमसे गहरे संबंध वाले तारों के लोगों का समर्थन, पृथ्वी-लोक पर और व्यापक, प्रबल और गहरे ढंग से काम कर पाने लगा है, यह पहलू भी है।
हम जिसे विशेष रूप से महत्व देते हैं, वह है तुम्हारे विकसित चेतना वाले हाकु-तत्व में ब्रह्मांडीय जीवन के स्रोत की ऊर्जा मिलाकर पृथ्वी की मानवता में बाँटकर, उन लोगों के मन और शरीर में, जो पृथ्वी पर रहते हुए भी अपने तारे के भविष्य के बारे में सोच नहीं पा रहे, चेतना के विकास को प्रेरित करने वाला विशेष प्रकाश उँडेलना।

पृथ्वी की नियति को उज्ज्वल दिशा में मोड़ने के लिए, अभी बहुत महत्वपूर्ण समय है।
तुम्हें सुनाई देता है न?
पृथ्वी की कराह……
दिखता है न?
पृथ्वी की पीड़ा का रूप……
महसूस होता है न?
पृथ्वी का काँपना……
पृथ्वी-जीव अभी बहुत बड़ा बोझ उठाए हुए है।
फिर भी पृथ्वी इस तरह टिकी हुई है, क्योंकि तुम हो।
क्योंकि तुम मानवता का प्रतिनिधित्व करके, माथा टेककर धरती माँ से क्षमा माँगते हो और उसके कार्य और उपकार के प्रति कृतज्ञता की प्रार्थना अर्पित करते हो, उसी प्रार्थना की ऊर्जा से पृथ्वी-जीव किसी तरह टिका हुआ है, यही सच्चाई है।
पृथ्वी की स्थिति अब भी आगे-पीछे की खींचतान में है।
द्वैतवाद में बात करना मुझे बहुत पसंद नहीं, लेकिन दिव्यता प्रबल होगी या कर्म-जनित विचार-समूह प्रबल होंगे, इसके अनुसार हर समय की नियति बेहतर या बदतर होती दिख सकती है, लेकिन दिव्यता को प्रकट करके जीने वाले तुम, कभी नकारात्मक विचारों में मत खिंचना।
लोग चाहे कोई उपाय न पाकर कितने भी चिंतित और भयभीत हों, तुम्हें सदा आशा का प्रकाश डालते रहना होगा।
जैसे ईसाई बाइबल में है, “प्रकाश हो, कहा तो वहाँ प्रकाश हुआ,” पृथ्वी-संसार का भविष्य रचने वाली तुम्हारी अपनी चेतना ही है, जो दिव्यता में जड़ जमाए ब्रह्मांड के हृदय का अंश-मन है। (समाप्त)






