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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

तारों को पूर्णता तक ले जाती आई ब्रह्मांडीय दिव्य आत्माओं (वांडररों) के नाम (पूर्वार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

★इस पूरे वर्ष पर पीछे मुड़कर देखते हुए

इस पूरे वर्ष पर पीछे मुड़कर देखो, तो तुम अपने बारे में कुल मिलाकर क्या कहोगे?

“बहुत अच्छा किया, कहने को कुछ नहीं”, या “बिल्कुल बेकार साल रहा”, तरह-तरह के विचार होंगे, लेकिन जो बिना घमंड या भ्रम के अपने को तटस्थ होकर देखकर, सही ढंग से अपने को स्वीकार कर पाता है, वह भाग्यशाली है।

क्योंकि वह व्यक्ति दिव्य क्षेत्र के संसार का निवासी है।

कभी-कभी बताता हूँ, आज का पृथ्वी-लोक “हर चेतना-स्तर के तरह-तरह के लोगों के एक जगह जमा होने वाला ‘चेतना का विश्व-मेला'” है, इसलिए अभी जागने के बीच रास्ते वाले लोगों से लेकर स्वर्गलोक के निवासियों तक, तरह-तरह के लोग ऊपरी तौर पर एक ही संसार में जी रहे हैं।

लेकिन उनके अलग-अलग ढंग को, आयामों की गहराई जोड़कर एक साथ ऊपर से देखो, तो वे तरह-तरह के चेतना-स्तर वाले लोग सब अलग-अलग संसारों में रहते हैं, और यह नहीं कहा जा सकता कि वे एक ही धरती पर खड़े हैं।

इसका क्या अर्थ है, तो एक ही धरती पर केवल भौतिक पैर टिके हैं, और पहचान की धरती सबकी बिल्कुल अलग-अलग आकाश-धरती में बिखरी हुई है।

इसका अर्थ है कि एक ही यथार्थ देखते हुए भी, वे बिल्कुल अलग ढंग से उसे ग्रहण करते हैं, देखते हैं, पहचानते हैं, और एक ही संसार को हर कोई मानो बिल्कुल अलग संसार की तरह देखता-सुनता है।

★चेतना जिस संसार में रहती है, उसके अनुसार संसार का रूप अलग दिखने के बारे में

मोटी बात करें, तो मान लो कोई प्राकृतिक आपदा हुई, और उसके परिणाम में एक शहर को विनाशकारी नुकसान हुआ।

उसके प्रति लोगों के ग्रहण करने का ढंग, व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है, है न। कोई तुरंत आगे देख पाता है, और कोई खोई चीज़ों की विशालता के कारण कुछ समय ठहर जाता है। दोनों में से किसी को भी कोई दोष नहीं दे सकता।

इस तरह जीने के ढंग अलग हो जाएँ, तो नहीं कहा जा सकता कि वे लोग एक ही संसार में जी रहे हैं।

ऐसा क्यों होता है, तो इसलिए कि सब लोग अतीत के विचार, वचन और कर्म के परिणाम में, जिस-जिस चेतना के आकाश-धरती में रहने लगे, वहीं से संसार को देखते हैं, इसलिए एक ही यथार्थ देखते हुए भी प्रतिक्रिया एक-सी नहीं होती।

यह वह तथ्य है जो यह यथार्थ दिखाता है कि एक ही संसार देखने पर भी, व्यक्ति के अनुसार दिखना और महसूस होना बिल्कुल अलग होता है।

सौभाग्य से तुम लोगों को स्वयं जीवन का सत्य जानने का अवसर मिला, और तुम पृथ्वी की बहुत सी मानवता को सत्य के महामार्ग से जोड़ने वाले पुल की भूमिका निभाते हुए, स्वयं सीधे-सच्चे ढंग से चेतना-विकास की ओर उन्मुख मार्ग पर चल रहे हो।

इस एक तथ्य को ही लो, तो सच में यह कोई साधारण बात नहीं है।

तुम लोग शायद अपनी ऐसी दुर्लभ स्थिति को भी “यह तो अपनी ही बात है” कहकर रूखेपन से टालते हुए स्वाभाविक मान लो, लेकिन आज तक के पृथ्वी-लोक में ऐसे जीने के ढंग पर टिके रह सकने वाले तुम लोगों के सिवा कोई नहीं हैं।

और “साधारण बात नहीं” इसलिए भी कहता हूँ कि कर्म के पूरी तरह न छँटे पृथ्वी-लोक में सत्य पर टिककर जीना, पूरे शरीर पर सैकड़ों किलो के पत्थर बाँधकर शान से दौड़ते रहने जैसा है, और यह हर कोई नहीं कर सकता।

इसे कर पाने के लिए, आत्मा को कितना निखारना-निखारना और कितना तपाना-तपाना पड़ा होगा, यह बात है।

हर तरह के जीवन-अनुभवों को बार-बार, बार-बार, बार-बार, बार-बार अनुभव कर चुके तुम लोग हो, इसीलिए यह संभव है। (अगली बार जारी)

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

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वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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