शाश्वत जीवन की धारा पर सवार हो जाओ (4)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★लोगों के मार्गदर्शन के ढंग के बारे में
तो लोगों के मार्गदर्शन के ढंग के बारे में थोड़ा समझाना चाहता हूँ। हाँ, बच्चे को साइकिल चलाना सिखाने वाले माता-पिता की स्थिति से सोचो तो शायद समझना आसान हो।
जैसे, जब बच्चा साइकिल चलाना सीख रहा हो, “बेचारा,” “खतरनाक” जैसे देखभाल के भाव से देखते हुए भी, अगर माता-पिता हमेशा साथ में हैंडल पकड़कर नियंत्रित करते रहें या पीछे से धक्का देते रहें, तो वह बच्चा कभी अपनी शक्ति से साइकिल नहीं चला पाएगा।
यही बात है।
तुम्हें अभी आत्मा का स्वावलंबन चाहिए, दूसरों पर निर्भरता बढ़ाना नहीं।
अगर पृथ्वी पर अब भी ऐसा मार्गदर्शन करने वाले धार्मिक या आध्यात्मिक नेता हों, तो वह मार्गदर्शन आने वाले युग के अनुरूप नहीं रहा है।
ऐसे मार्गदर्शन की गहराई में ध्यान खींचने या लोगों के ऊपर खड़े होने जैसे भाव अनजाने में मिल जाना अक्सर होता है।
चाहे वह कितना भी प्रसिद्ध, सबका जाना-पहचाना व्यक्ति क्यों न हो।
इसलिए जो खुद पर निर्भर कराना चाहता है, या सोचता है कि उसके ज़रिए हुए बिना सुधार नहीं होगा, वह सच्चा नेता नहीं कहलाता।
और “मेरे धर्म के बिना दुनिया नहीं बच सकती” वाली सोच भी आने वाले युग के सच्चे नेता के स्वरूप से थोड़ी अलग है।

क्योंकि सच्चा नेता वह है जो लोगों को उनके अपने जीवन-ढंग के ज़रिए सचमुच आत्मा का स्वावलंबन पाने की दिशा दे।
खासकर जहाँ मनुष्य मनुष्य का मार्गदर्शन करता है, वहाँ खुद पर निर्भर या आश्रित कराने वाला मार्गदर्शन, 20वीं सदी तक की बात अलग, 21वीं सदी में आ चुके अब के समय में बिल्कुल न चलने वाली अतीत की नेता-छवि बन चुकी है।
इसलिए हम पृथ्वी के अतीत के आध्यात्मिक नेताओं की तरह “देव-बुद्ध में विश्वास करो” नहीं कहते, न “देव-बुद्ध की शरण लो” कहते हैं।
हम कहते हैं, “सब जीवंत होकर «जीवन का प्रकाश» प्रकट करते हुए जीओ। तुम्हारे जीवन का सार मूल रूप से दिव्य अस्तित्व है। उसे प्रकट करके जीने का तरीका यह-यह है।”
देव या बुद्ध कहने पर मनुष्य की जड़ धारणा से “स्वर्ग में विराजमान सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान ईश्वर…” जैसी सोच बनती है और “उद्धार चाहिए, उद्धार पाऊँ, उद्धार करवाऊँ” जैसी पर-निर्भर सोच आसानी से हो जाती है।
और देव-बुद्ध के नाम पर संप्रदायों के झगड़े जैसी चीज़ें बार-बार होती रही हैं।
महत्वपूर्ण यह है कि हर मनुष्य दिव्य अस्तित्व है, शाश्वत जीवन जी रहा अस्तित्व है।
और जीवन की उस शाश्वतता को अपने में प्रकट करना।
बस यह मूल न छूटे, तो कोई भी संप्रदाय हो, कोई हर्ज नहीं।
जीवन का सार, यानी जीवन का मूल स्रोत एक ही है यह समझ आए, तो किसी भी संप्रदाय के धार्मिक विश्वासी, आध्यात्मिकतावादी, आध्यात्मिक विचार वाले, सब हाथ मिलाकर सहयोग करते हुए, एक-दूसरे को दक्षिणपंथी या वामपंथी कहे बिना, सब “मिल-जुलकर” पृथ्वी की शांति के लिए काम कर सकते हैं। (जापानी में दक्षिणपंथी को “उयोकु”, वामपंथी को “सायोकु” और मिल-जुलकर को “नाकायोकु” कहते हैं।)
इसलिए सीधे कहें तो, बस सब जीवन के सार में एक होकर जीएँ, तो विचारों के अंतर पार करके डूबते जहाज़ जैसी पृथ्वी की स्थिति की मरम्मत (फ़ालतू पानी बाहर निकालकर) करके भविष्य की यात्रा जारी रखी जा सकती है। (अगली बार जारी)






