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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

अपने अधिकार का सही उपयोग करके जीने के लिए (मध्य भाग)

प्रकाशित अद्यतन

(पिछली बार से जारी)

★मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ पर विचार करें

क्या तुमने कभी सोचा है कि मनुष्य पृथ्वी पर क्यों है, यानी उसके अस्तित्व का अर्थ क्या है?

मनुष्य के अस्तित्व का अर्थ, पहले और दूसरे दोनों नंबर पर, अपने-अपने कार्य-क्षेत्र में समग्र सामंजस्य लाने वाली सृजनशीलता को प्रकट करने में है।

फिर भी, उससे बाहर के विचार और कर्म करने वाले लोग हैं, यह बात 20वीं सदी तक के पुराने युग के स्पंदन-क्षेत्र में तो चलो ठीक थी, लेकिन अब जब 21वीं सदी के भी दस-कुछ वर्ष बीत चुके हैं और कुछ हद तक आत्मिकीकरण आगे बढ़ चुका है, मानवता की चेतना का भी विकसित हो जाना स्वाभाविक है, इसलिए उस उच्च आयाम के सार्वभौमिक सत्य से देखें, तो वह प्राकृतिक परिवेश और दूसरे जीवों के प्रति अधिकार का अतिक्रमण है, और दूसरे लोगों के काम में बाधा डालना भी है।

पुराने मूल्यों को परम मानने वाले भौतिक मनुष्य यह नहीं समझ पाए, और अनजाने में दूसरों के अधिकार का उल्लंघन करने वाले काम दोहराते रहे।

उसका परिणाम आज का संसार है।

समझ रहे हो न।

पृथ्वी को, चाहे या न चाहे, विकसित (आत्मिकीकृत) होना ही है।

क्योंकि आखिरकार पूर्णता की बारी आ पहुँची है।

इस तरह स्थिति अब बिना देर के वाले चरण में आ गई है, इसलिए पृथ्वी को सही ढंग से ब्रह्मांड के नियम पर चढ़ाकर, उसे विकसित तारे के रूप में आयामी उत्थान कराने के लिए, जिन्होंने मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ के बारे में कभी सोचा ही नहीं, उन्हें भी किसी दिन अपने अस्तित्व के अर्थ का सही उत्तर निकालने की आवश्यकता आ पड़ेगी; और ऐसे लोग भी हैं जिनके लिए वह घड़ी पहले ही आ चुकी है और जो अपने अस्तित्व का अर्थ खोज रहे हैं, और ऐसे भी हैं जो उसे पा चुके हैं और वही बनने के लिए चल पड़े हैं।

क्योंकि हर व्यक्ति का हायर सेल्फ़ उस व्यक्ति के अहं-विचारों का (ऐकिडो जैसे सिद्धांत से) उपयोग करके, हर एक की नियति को उसी दिशा में ले जा रहा है।

★अधिकार दूसरों को सौंपकर संचालित न होने वाली जीवन-शैली के बारे में

अब, अपनी चेतना दूसरों को सौंपकर मनमाने ढंग से संचालित नहीं होना चाहिए, इसका क्या अर्थ है, तो आज तक के संसार में बहुत से लोग अपने अधिकार को पूरा करने की सीख के चरण से उत्तीर्ण हुए बिना उस लोक में लौट जाते हैं, वहाँ भी वह सीख पूरी न कर पाकर, फिर भौतिक लोक में पुनर्जन्म लेकर उसी चरण में चक्कर काटते रहते हैं; मानसिक दृष्टि से यह ज़िम्मेदारी टालने की अवस्था या “आराम से अच्छा अनुभव करना है” वाली इच्छा में जकड़े चेतना-स्तर में होना है, और ऐसी अवस्था में मिलते-जुलते विचार-स्पंदन वाली अशुद्ध, अमुक्त आत्माओं और सूक्ष्म जीवों से चेतना की तरंग आसानी से मिल जाती है, और न जाने कब उनके प्रभाव में आकर व्यक्ति चलने लगता है।

इसीलिए कहते हैं कि अपना अधिकार दूसरों को नहीं सौंपना चाहिए।

जो लोग शरीर की मृत्यु के बाद अपने जाने योग्य लोक में न लौटकर इस दुनिया के निकट के स्पंदन-क्षेत्र में ठहरे रहते हैं, वे कर्म-स्तर के विचार-स्पंदन बहाते हुए धरती के आसपास के सूक्ष्म लोक के अंतरिक्ष में भटकते रहते हैं, और अगर ऐसे विचार-स्पंदन या विचार-स्पंदन के समूह (एक-सी तरंग वाले विचारों के आपस में जुड़कर बने बड़े पिंड) के साथ तुम्हारी अपनी छोड़ी तरंग प्रतिध्वनित हो जाए, तो वे “यही मौका है” समझकर उस व्यक्ति के शरीर में घुस जाते हैं, अपनी अधूरी इच्छाएँ पूरी करने या वासना-विचारों को पूरा करने की कोशिश करते हैं, और उस व्यक्ति के माध्यम से गुप्त रूप से काम करते हैं।

ऐसा होने पर वह व्यक्ति कभी-कभी ऐसा काम भी कर बैठता है जो विवेक के सतह पर होने पर वह शायद ही करता।

समझ रहे हो?

शायद तुम सोचो, “अगर ऐसा है, तो वह काम उस व्यक्ति ने किया तो सही, पर उसकी ज़िम्मेदारी तो उसकी नहीं बनती न,” लेकिन परिस्थिति चाहे जो हो, अगर वह खुद अपना अधिकार दूसरों को न सौंपे तो ऐसी स्थिति हो ही नहीं सकती, इसलिए अंतिम ज़िम्मेदारी उसी व्यक्ति की है जिसने अपना मन और शरीर दूसरों को सौंप दिया।

इसीलिए कहते हैं, “अपनी नियति की पतवार तुम्हारे अपने हाथ में है।” (अगली बार जारी)

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

Angelusbell

वीडियो जल्द आ रहे हैं

वीडियो एक-एक करके जारी किए जाएँगे।

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