दिव्य क्षेत्र के दृष्टिकोण को अपने भीतर धारण करने के लिए (1)
प्रकाशित अद्यतन
★दिव्य चेतना हर किसी के भीतर आदि से है
अगर तुम सच्ची दिव्य चेतना में खड़े होकर देखो, तो टकराव से परे के दृष्टिकोण से दुनिया को देख सकोगे।
जिसे अपने अनुभव के आलोक में यह बात दिल में उतर गई, वह पहले ही दिव्य चेतना को अपने मन और शरीर में धारण कर चुका है, यह कहा जा सकता है।
इसके उलट, जिसे दिल में न उतरे, उसे भी इससे निराश होने की ज़रूरत नहीं।
क्योंकि आज की बात पढ़कर उस पर अमल करो, तो दिव्य चेतना का पहला पाठ कोई भी सीख (याद कर) सकता है।
मान लो एक बार में समझ न आए, तो भी इस बात को कई बार पढ़कर ध्यान और एकाग्रता दोहराते-दोहराते, चेतना के विकास की ओर उन्मुख हर व्यक्ति के लिए अवश्य वह समय आएगा जब वह इसे सचेत रूप से समझ सकेगा।
क्योंकि यह बात तुम्हारे मन की गहराई में स्थित दिव्य क्षेत्र की गूँज की ही बात है।
तो, यहाँ से असली बात शुरू होती है।

ठीक है?
“जब तक मनुष्य के मन में अलगाव की धारणा है, तब तक दुनिया में सामंजस्य नहीं होगा, और जब तक टकराव की अवधारणा मानवता की चेतना से चिपकी है, तब तक दृश्य जगत में शांति नहीं आएगी।”
पहले इन शब्दों के अर्थ को अच्छी तरह चबाकर, मन में उतारकर देखते हैं।
मानवता मूल रूप से ऐसा अस्तित्व है जिसमें हर किसी के भीतर पवित्रता का वास है, और पृथ्वी के लोग भी मूल रूप से पृथ्वी की दिव्य मानवता कहलाने योग्य अस्तित्व हैं, लेकिन उस मूल स्वभाव को पूरी तरह भूल जाने के कारण उन्होंने ऐसा समाज रच लिया जिसमें दुःख का अंत नहीं होता।
थोड़ा समझाऊँ तो, मूल स्वभाव यानी दिव्यता को भूल जाने का कारण यह था कि भौतिक जगत नाम के ब्रह्मांड के सबसे दूरस्थ आयाम-लोक (ऐसा स्पंदन-क्षेत्र जिससे स्थूल स्पंदन और कोई नहीं) को विकसित करने के लिए उन्होंने शरीर नाम का असुविधाजनक वस्त्र पहनकर काम करना शुरू किया।
मैं हमेशा कहता हूँ, मनुष्य के शरीर में, भौतिक शरीर उतारो तो सूक्ष्म देह है, सूक्ष्म देह उतारो तो आत्म-देह है, और आत्म-देह भी उतारो तो दिव्य-देह सतह पर आ जाती है।
और उस दिव्य-देह को भी उतारो, तो जीवन-प्रकाश की चेतना नाम का सच्चा हृदय, असली स्वरूप है।
वह रूप-आकार रहित, ब्रह्मांड जितनी फैली चेतना कही जा सकती है, और इस तरह परम विशाल चेतना होते हुए भी, अगर सभी अस्तित्वों को बारीकी से विभाजित करके देखो, तो वह परम सूक्ष्म कणों का स्पंदन ही है।
इस तरह, ब्रह्मांड में व्याप्त परम सूक्ष्म स्पंदन ही होते हुए भी, महाब्रह्मांड को पूरी तरह लपेटकर समस्त सृष्टि को अस्तित्व देने वाली परम विशाल चेतना भी होना, यही दिव्य मानवता के सार यानी दिव्यता का मर्म है, परम सच्चा हृदय और असली स्वरूप है। (अगली बार जारी)






