आत्म-विश्वास से आत्म-देवत्व तक का असेंशन
प्रकाशित अद्यतन
आत्म-विश्वास के बारे में
★पृथ्वी के लोगों की भाषा में “आत्म-विश्वास है” या “आत्म-विश्वास नहीं है” जैसे शब्द हैं।
जापानी में आत्म-विश्वास को “जिशिन” कहते हैं, जो “स्वयं” और “भरोसा” के अक्षरों से लिखा जाता है। यह शब्द अक्सर इस अर्थ में इस्तेमाल होता है कि कोई काम किया जा सकता है, या उसके लिए क्षमता है। लेकिन मैं यहाँ साफ़ कह देता हूँ कि “आधे से ज़्यादा पृथ्वीवासी अभी भी ब्रह्मांड-मानक के «आत्म-विश्वास» को जाने बिना जी रहे हैं।”
★इसका मतलब यह है कि पृथ्वी के लोग जिसे «आत्म-विश्वास» समझते हैं, वह धारणा तीसरे आयाम की दुनिया के मानक द्वैत-विरोध की दृष्टि से चिपके हुए भावों की हलचल भर है।
«तीसरे आयाम की दुनिया के मानक द्वैत-विरोध की दृष्टि से चिपके भाव» कहने पर शब्द कठिन लग सकते हैं, लेकिन सरल शब्दों में इसका मतलब है कि “कर सकता हूँ” और “नहीं कर सकता,” “ठीक है” और “ठीक नहीं है,” “है” और “नहीं है,” “संभव” और “असंभव” की तरह “विश्वास” और “अविश्वास” हर बात में एक ही सिक्के के दो पहलू बने हुए हैं और चेतना ऐसी स्थिति में है जहाँ इन्हें अलग नहीं किया जा सकता।
★ऐसी पीठ-से-पीठ जुड़ी धारणाओं से चिपक जाने और भावों को वहाँ से अलग न कर पाने के कारण, जब कोई सोचता भी है “मुझे अमुक चीज़ में आत्म-विश्वास है,” तब भी किसी कठिन स्थिति का सामना होते ही उसका उजला मन अँधेरा हो जाता है, आत्म-विश्वास अचानक सिकुड़कर टूट जाता है, सकारात्मक से नकारात्मक हो जाता है, यानी भाव 180 डिग्री पलट जाते हैं और चेतना भ्रम के अंधकार में गिर जाती है।
आत्म-विश्वास का आयामी उत्थान ~ आत्म-विश्वास से आत्म-देवत्व तक
★असली आत्म-विश्वास इस तरह की डगमगाने वाली चीज़ नहीं है, जो कुछ होते ही अपनी जगह बदल ले।
असली आत्म-विश्वास उस चेतना को कहते हैं जिसने जान लिया है कि मानवता का सच्चा हृदय और मूल स्वरूप क्या है, जो उससे मज़बूती से जुड़ी है और स्वयं वही बनकर जी रही है।
हर मनुष्य मूल रूप से ब्रह्मांड की सृजन-ऊर्जा का हिस्सा रखने वाला अस्तित्व है, है न?
इसे «दिव्यता» कहें, तो असली आत्म-विश्वास वह मानसिक अवस्था है जिसे “आत्म-देवत्व” (जापानी में “जिशिन” शब्द को “स्वयं-देव” के अक्षरों से लिखने पर) कहा जा सकता है।
★अपने प्रति «आत्म-विश्वास» को «आत्म-देवत्व» में आयामी उत्थान देना महत्वपूर्ण है।
यह किसी भी चीज़ या घटना से न डिगने वाली, «अनंत शक्ति» वाली चेतना की अवस्था है, इसलिए इसका मतलब है कि चेतना ऐसी स्थिति में है जो सभी द्वैत धारणाओं से ऊपर उठ चुकी है।
★ब्रह्मांड के लोग सब ऐसे ही आध्यात्मिक जगत में जीते हैं।
हर व्यक्ति जानता है कि संभावनाओं का द्वार उसके अपने भीतर है, इसलिए पृथ्वी के अलावा दिव्य बन चुके तारों पर एक-दूसरे से छीनने की कोई ज़रूरत ही नहीं होती।
इसीलिए वहाँ लोगों के बीच कलह पैदा नहीं होता।
क्योंकि उनकी चेतना सहज रूप से जानती है कि अपना «आत्म-देवत्व», अपने प्रति परम आत्म-विश्वास, मूल में सभी लोगों के साथ एक ही जड़ का है, इसलिए वहाँ कोई भी सामंजस्य भंग करने वाले विचार, वचन या कर्म तक नहीं पहुँचता।
★पृथ्वी पर भी यही बात है।
मानवता से आगे बढ़कर जो लोग अपने भीतर «आत्म-देवत्व» के साथ जी रहे हैं, उनकी चेतना जान चुकी है कि उस आत्म-विश्वास का मूल स्रोत सबमें एक ही है।
वह अनंत सृजन-ऊर्जा से भरा दिव्य क्षेत्र है, ऐसी दुनिया जहाँ सारी भौतिकता और आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति के मूल कण अक्षय मात्रा में हैं, इसलिए वे अपने आत्म-विश्वास (आत्म-देवत्व) का उपयोग करके “ऐसा करना चाहता हूँ, ऐसा होना चाहता हूँ” जो सोचते हैं, उसे एक के बाद एक साकार करते हुए जीते हैं।
साथ ही वे सिर्फ़ अपनी खुशी भोगने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उन बहुत-से लोगों के लिए भी, जो अभी जीवन की एक ही जड़ वाली चेतना को भूल चुके हैं, एकत्व क्या है इसे स्वयं अनुभव करके उस चेतना-स्पंदन को धरती पर प्रसारित करते हैं, और इस तरह पृथ्वी की मानवता की चेतना के विकास और असेंशन को परोक्ष रूप से सहारा देने का काम भी करते हैं।
आत्म-देवत्व ~ भूकंप-रहित दुनिया बनाने की कुंजी
★मानवता को पृथ्वी पर आकर इस धरती पर बसे हुए कई लाख साल हो गए हैं।
तुम लोगों के पुनर्जन्मों की संख्या और आत्माओं के मिश्रण की स्थिति भी अलग-अलग है, इसलिए मूल रूप से मौजूद «आत्म-देवत्व» को याद करना शायद काफ़ी कठिन हो।
लेकिन पृथ्वी की मानवता के संरक्षक देवता और आत्माएँ हर हाल में इसी जीवन में चाहते हैं कि जिस भौतिक मनुष्य की वे रक्षा करते हैं, वह ब्रह्मांड के सत्य के प्रति जागे और «महान सामंजस्य» नाम के ब्रह्मांडीय नियम की कक्षा पर जी सके, और इसी दिशा में मार्गदर्शन कर रहे हैं।
नियमों का संचालन करने वाले ब्रह्मांड के देवता भी पृथ्वी-जगत को हर हाल में पूर्ण करके ब्रह्मांडीय समाज में शामिल करने के लिए दिन-रात स्पंदन-समायोजन कर रहे हैं।
उनमें से एक है भूकंप (जापानी में इसे भी “जिशिन” कहते हैं)।
भूकंप, आकाशीय घटनाओं द्वारा शुद्धि के साथ-साथ, मानव-चेतना की विकृति को बड़े पैमाने पर समायोजित करने वाला शुद्धि का एक साधन है।
★भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का एक पहलू यह भी है कि वे पूरी मानवता के चेतना-स्पंदन की शुद्धि के रूप में घटती हैं। लेकिन यह प्रभावित भूमि या लोगों को दोष देने की घटना नहीं है, बल्कि सारी मानवता के मिलकर «आत्म-देवत्व» को याद करने के लिए एक बड़ा जागरण-संकेत है।
क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, विश्वासघात, स्वार्थ और अविश्वास जैसे आत्मकेंद्रित विचारों से भरी अवस्था पृथ्वी के जीव-शरीर को दूषित करती है।
वह भूपर्पटी की विकृति और वायु-प्रवाह की गंदगी के रूप में प्रकट होती है।
इसलिए पृथ्वी का जीव-शरीर अपना शरीर झटककर विकृति को ठीक करने की कोशिश करता है।
वायु-प्रवाह की अशुद्धि को ड्रैगन देवता शुद्ध करके धरती-आकाश की “की” (प्राण-ऊर्जा) की निर्मलता बनाए रखने की कोशिश करते हैं।
प्राकृतिक आपदाओं में शायद पूरी मानवता के भावों की स्थिति भी शामिल है। लेकिन यह प्रभावित लोगों को दोष देने की बात नहीं है, बल्कि सारी मानवता से मिलकर अपने भावों को ठीक करने का आह्वान है।
★अगर समझ गए, तो करने योग्य बस एक ही काम है।
असली «आत्म-विश्वास», अपने प्रति «आत्म-देवत्व» के साथ जीना।
यह वह चेतना है जो जानती है कि पूरी मानवता और सभी जीव एक ही स्रोत से जुड़े हैं, इसलिए उसमें असामंजस्य बिल्कुल नहीं है, बस सामंजस्यपूर्ण चेतना-स्पंदन ब्रह्मांड में गूँजता रहता है।
जब बहुत-से लोग ऐसी अवस्था तक «चेतना का विकास» कर लेंगे, तब पृथ्वी-जगत से सारे भूकंप मिट जाएँगे और ऐसी दुनिया खुलेगी जहाँ भूकंप की ज़रूरत नहीं, जो आत्म-देवत्व से भरी है।







