दिव्य क्षेत्र के मन को निखारें (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
इसी नाम का पिछला लेख
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(पिछली बार से जारी)
★गरिमा को दिव्य चरित्र तक आयामी उत्थान देने के लिए
तो, मैंने बताया था न कि गरिमा के चरम रूप, सर्वोच्च गरिमा को दिव्य चरित्र कहते हैं।
और यह भी बताया था कि हर व्यक्ति में दिव्यता है।
इसका अर्थ है कि जिस व्यक्ति में दिव्यता का एक टुकड़ा भी न दिखे, उसमें भी गरिमा है, बस वह कर्म के विचारों से मैली होकर सतह पर प्रकट नहीं हो रही।
पृथ्वी के सब लोगों के मन की गहराई में दिव्यता है, इसलिए हर व्यक्ति में गरिमा है, उसकी गहराई में आत्मिक चरित्र है, और उससे भी गहरे में दिव्य चरित्र है।
बस बहुत से लोगों का मन बिना तराशे हीरे जैसा हो गया है, और जीवन के प्रकाश की चमक बिखेर नहीं पा रहा।
वह अवस्था खरे-खोटे मिले हुए मानवीय चरित्र की है, जिसमें गरिमा प्रकट नहीं हुई। (चेतना-स्तर प्राथमिक विद्यालय का विद्यार्थी)
तो, भौतिक शरीर की ओर से जीवन के मूल स्वरूप यानी दिव्यता को फिर से जगाने के लिए, पहले दिव्यता का वह रूप निखारो जो भौतिक शरीर के सबसे पास है, यानी गरिमा।
तब, जैसे उस उम्र में पहुँचने पर प्राथमिक विद्यालय से माध्यमिक विद्यालय में अपने-आप पहुँच जाते हैं, वैसे ही अनिवार्य रूप से तुम गरिमा धारण किए व्यक्ति बनने लगते हो।
वहाँ गरिमा को निखारकर चमचमाते जाओ, तो जैसे हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षा पास करके माध्यमिक से हाई स्कूल में जाते हैं, वैसे ही आत्मिकता पर आधारित आत्मिक चरित्र प्रकट करने वाले व्यक्ति बनते जाते हो।
वहाँ फिर आत्मिकता को निखारकर आत्मिक चरित्र ऊँचा करते जाओ, तो जैसे विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा पास करके हाई स्कूल से विश्वविद्यालय में जाते हैं, वैसे ही दिव्यता पर आधारित दिव्य चरित्र को सीखने और प्रकट करने के चरण में प्रवेश करते हो।
दिव्य चरित्र का चरण, उससे पहले से भी कहीं अधिक, अनंत कहे जा सकने वाली गहराई वाला संसार है।
वहाँ ज़रा भी लापरवाही हुई तो फिर तुरंत आत्मिक चरित्र की सीख पर लौट जाना स्वाभाविक है, ऐसा वह संसार है, इसलिए दिव्य चरित्र सीखने और प्रकट करने के चरण में आ गए, इससे ढील नहीं देनी चाहिए।

वैसे उस अवस्था तक पहुँचने वालों में लापरवाही शुरू से ही नहीं होती, लेकिन तुम लोगों को आसानी से समझाने के लिए ऐसा कह रहा हूँ।
तो, प्रारंभिक और मध्य स्तर कहे जा सकने वाली गरिमा और आत्मिक चरित्र को निखारने के लिए क्या करें, तो रोज़ की साँस को धीमा और आरामदायक रखने को आधार बनाकर,
“मैं गहरे प्रेम वाला बनूँ”
“मेरा मन प्रेम से भर जाए”
“मुझे केवल प्रेम वाला बना दीजिए”
ये शब्द, मन की गहराई में रहकर स्वयं का मार्गदर्शन करने वाले हायर सेल्फ़ को अर्पित करने की तरह, सच्चे मन की आवाज़ से पुकारते रहो।
बोलकर कह सको तो वह बेहतर है, लेकिन जिन्हें अकेले होने का समय आसानी से नहीं मिलता, वे केवल मन ही मन पुकारते रहें, तो भी ठीक है।
केवल इतने से भी थोड़े ही दिनों में बड़ा असर दिखता है, और तुम्हारा मानवीय चरित्र पूरी तरह गरिमा और आत्मिक चरित्र वाले स्वभाव में बदल जाता है, इसलिए करके देखो।
और, आत्मिक चरित्र के चरण से दिव्य चरित्र के चरण तक कदम बढ़ाने के लिए क्या करें, तो जैसे तुम अपने जीवन के सार को दिव्यता ही मानना स्वाभाविक रूप से स्वीकार करते हो, वैसे ही सारी मानवता की दिव्यता को भी स्वाभाविक मान्यता से स्वीकार करो।
इसका अर्थ है, अपनी और दूसरों की दिव्यता को हर स्थिति में स्वीकार करने वाले विचार, वचन और कर्म को पूरी तरह काम में लाना।
इसे करते रहो, तो शुरू में (गरिमा से पहले के साधारण मानवीय चरित्र के चरण में) जो आधे विश्वास, आधे संदेह से करते थे, पता ही नहीं चलता कब दिव्य क्षेत्र में जड़ें जमाई स्वाभाविक मान्यता निखरकर सामने आने लगती है, और वह दिन आता है जब तुम बिना किसी झूठ-फरेब के सोच पाते हो, “जैसे मैं दिव्य अस्तित्व हूँ, वैसे ही सारे लोग भी दिव्य अस्तित्व हैं। इसलिए ऊपर से दिखने वाले विचार, वचन और कर्म कैसे भी हों, हर कोई निश्चित रूप से दिव्यता को फिर से जगाएगा, और वह समय आएगा जब महान सामंजस्य वाला संसार पृथ्वी पर भी खुलेगा।”
हम चाहते हैं कि पृथ्वी-लोक में ऐसा सोच पाने वाले लोग जितने अधिक हो सकें उतने बनें।
इसीलिए हम इस तरह हर दिन तरह-तरह के ढंग से, सत्य की बातें तुम्हें बता रहे हैं। (समाप्त)






