उस सत्य के बारे में जिससे जीवन का अधिकार दूसरों को सौंपे बिना रहा जा सकता है (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★आत्मा को स्वावलंबी बनाने के लिए
हड्डी टूट गई या ख़ून बहना बंद नहीं हो रहा, ऐसी शरीर की बाहरी चोटों का डॉक्टर से इलाज करवाना, इसमें कोई समस्या नहीं।
फिर शरीर के भीतर की गड़बड़ी या बीमारी वग़ैरह भी, डॉक्टर को दिखाकर दर्द कम करवाना या ठीक करवाना महत्वपूर्ण है।
अंत में मन का कष्ट, चिंता और भय, क्रोध और घृणा, दुःख और अकेलापन आदि, इनमें भी भरोसेमंद व्यक्ति या विशेषज्ञ से मदद लेना महत्वपूर्ण है। इसके बाद, मूलभूत उपचार अंत में अपने भीतर से उठता है।
ऐसा कहने पर भी, कोई कहेगा, ज्योतिषी को दिखाया तो बहुत निश्चिंत हुआ, या हीलिंग करवाई तो मन हल्का हो गया?
हाँ, वह भी ज़रूर सच्चा अनुभव है। बस, वहाँ मन का हल्का होना अक्सर इसलिए होता है कि ज्योतिषी से बातचीत में मन की बात बाहर निकाल पाए, या हीलिंग पाकर निश्चिंत हो पाए।
किसी को अपनी परेशानी बताकर मन हल्का हुआ, ऐसा अनुभव काफ़ी बहुत लोगों ने किया होगा न?
और बचपन में “यह नहीं खाओगे तो बड़े नहीं हो पाओगे” कहकर माँ के बहकावे में आकर, बड़े होने की दवा मानकर, नापसंद खाना खा लेने का अनुभव भी बहुतों का होगा न?
मनुष्य मन की उलझन दूसरों के सामने निकाल दे तो अस्थायी रूप से आराम मिलता है, और प्लेसीबो प्रभाव हो तो अस्थायी रूप से ठीक हो जाने जैसा भ्रम भी होता है।
पर इससे कारण पूरी तरह नहीं मिटता, इसलिए वही कष्ट रूप बदलकर फिर आता है।
इसलिए केवल इतने से उसी कष्ट की जगह पर गोल-गोल घूमते रह जाना भी होता है, और मूल समाधान के लिए एक क़दम और, अपने भीतर से समझ महत्वपूर्ण बनती है।
मनुष्य की बनावट ऐसी है कि खुद न बदले तो दुनिया नहीं बदलती, और खुद बदले तो दुनिया बदल जाती है, एक भी अपवाद के बिना।
इसलिए जब तक निर्भरता की अवस्था में जी रहे हो, आत्मा का स्वावलंबन काफ़ी कठिन है, और जब तक जीवन का अधिकार दूसरों को सौंपा हुआ है, कुछ होने पर कारण बाहर खोजना या इसके उलट दूसरों से चिपक जाना बार-बार दोहराना आसान है।
हमारी नज़र से तुम लोगों को पृथ्वी के स्पंदन के विकास के साथ चेतना को भी उसी तरह विकसित करते जाना चाहिए, फिर भी पुराने ढर्रे पर आदतन विचारों में बहने वाला हिस्सा अभी दिखता है।
यह बहुत अफ़सोस की बात है।
मनुष्य क्या कैसे पहचानता है और खुद क्या चुनकर जीता है, इसी से कैसा जीवन रचेगा इसकी दिशा अपने आप तय होती जाती है।
तो आज का भाग्य और जिसे “है” मानकर देख रहे हो वह दुनिया, अतीत के विचारों के प्रकट होकर मिटने की ओर जाने वाली दुनिया है।
हमारे ऐसा कहने पर भी, तुम क्या वास्तविक मानकर देखते हो और क्या माया मानकर देखते हो, रोज़ की पहचान कैसे इस्तेमाल करते हो, इसका पतवार थामने का निर्णय-अधिकार केवल तुम्हारे पास है।
यह मूल रूप से और कोई भी चीज़ तुम पर थोप नहीं सकती, और कोई भी तुम्हें प्रभावित नहीं कर सकता।
फिर भी, “दूसरों से प्रभावित हो रहा हूँ” या “कोई प्रभावित करे” सोचते आए इस भ्रम को अभी इसी क्षण से काट दें।

★दिव्यता में लौटने के लिए
मनुष्य का सार, दिव्यता, इतनी कमज़ोर चीज़ नहीं।
सत्य से कहें तो सच्चे मनुष्य में कष्ट नहीं है।
क्योंकि बस सत्य जीते रहो तो कष्ट है ही नहीं।
इसलिए कष्ट महसूस होने पर, यह “विचारों के इस्तेमाल के ढंग पर फिर से नज़र डालो” ऐसी जीवन की ओर से आई कोमल सूचना-घंटी जैसा भी है।
उस घंटी को बंद करने का तरीक़ा है: “अच्छा, यही सत्य से हटा हुआ विचारों का इस्तेमाल था,” कहकर कष्ट के कारण को हथेली पर रखकर, “मैं अब समझ गया, इसलिए तुम्हारा दायित्व समाप्त। धन्यवाद, तुमने मेहनत की,” कहकर कृतज्ञता से सराहना करना।
तब वही कष्ट अब दोबारा तुम्हें नहीं सताएगा।
क्योंकि वह मन की गहराई के आकाश में एक क़दम पहले चढ़कर, तुम्हारी मदद करने वाली शक्ति बन गया है।
ठीक है, ध्यान से सुनो।
तुम्हें छूने वाला कुछ भी नहीं है।
तुम्हें सताने वाला भी कुछ नहीं है।
तुम्हें दुखी करने वाला कुछ नहीं, तुम्हें घृणा की ओर ले जाने वाली कोई शक्ति भी नहीं।
जो है वह केवल और केवल, दिव्यता भूले हुए युग से न छोड़ पाई गई, अपनी सत्य से हटी हुई विचार-आदतें भर हैं।
उन्हें छोड़ने का तरीक़ा है गहरी साँस के साथ सत्य की प्रार्थना।
प्रार्थना जीवन के प्रकाश में लौटने का रास्ता बनाती है।
रास्ता बनाना भी और उस रास्ते पर चलकर अपने मूल स्रोत तक लौटना भी, सब खुद करने का काम है।
बस यह न भूलो तो ठीक है।
क्योंकि तुम मूल रूप से दिव्य अस्तित्व ही थे।






