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तारों के साथ संवाद के युग का द्वार खोलने के लिए

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

Voice of Space Brothers

समुद्र और चेतना का विकास (पूर्वार्ध)

प्रकाशित अद्यतन

★समुद्र मन है, मन समुद्र है

समुद्र की तुलना मन से की जा सकती है।
यानी सतही चेतना समुद्र की सतह है, और सबसे गहरी दिव्य-देह की चेतना गहरा समुद्र (देवलोक) है, इस तरह।

बीच में समुद्र की और भी परतें (स्तर) हैं, लेकिन रास्ते में भटके बिना मंज़िल (जीवन के मूल स्रोत) तक पहुँचने के लिए, आज बीच की बातें छोड़कर, केवल समुद्र की सतह (सतही चेतना) और गहरे समुद्र (दिव्य चेतना) को आपस में जोड़कर देखते हैं।

जब समुद्र की सतह पर तूफ़ान आता है, तो लहरें कई दसियों मीटर ऊँची उठकर डरावना रूप दिखाती हैं, लेकिन शांत मौसम में वह कोमल और स्नेहमय होती है, और जब तुम उसकी धीमी लहरों के हिलोरों पर खुद को छोड़कर तैरते हो, तो तुम्हारी मस्तिष्क-तरंगें अपने आप अल्फ़ा या थीटा तरंगें बन जाती हैं, और तुम जीवन के स्रोत के निकट के स्पंदन वाले मन का अनुभव भी कर लेते हो।

इस तरह मनुष्य के मन की तुलना समुद्र से की जा सकती है, लेकिन सच में तो भौतिक मानव-शरीर का जन्म समुद्र से हुआ है, यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी, इतना घनिष्ठ संबंध मानवता और समुद्र के बीच है।

ऐसा क्यों कहता हूँ, क्योंकि समुद्र के जल को बनाने वाले अधिकांश तत्व वही हैं जो मानव-शरीर को बनाते हैं, और गर्भ के भीतर का एमनियोटिक द्रव तो ऐसे तत्वों से बना है जो समुद्र के जल के इतने करीब हैं कि उसे लगभग समुद्र का जल ही कहा जा सकता है।

आज की बात मानव-शरीर की बनावट के बारे में नहीं, बल्कि मन और चेतना के बारे में है, इसलिए शरीर बनाने वाले तत्वों की बात यहीं तक रखते हैं, लेकिन समुद्र और मानवता के संबंध को, और जल और जीवन के संबंध को खोलकर देखो, तो वहाँ से भी जीवन के प्रकाश को खोजने का द्वार खुल सकता है, इतनी बड़ी बात है यह।

बात पर लौटें तो, अगर तुम गहरे समुद्र (देवलोक) के चेतना-क्षेत्र को समुद्र की सतह (सतही चेतना) तक खींचकर जी सको, तो समुद्र में तूफ़ान आने की तरह भावनात्मक विचारों की उफनती लहरें उठाना, या उनमें डूबकर खुद को खो देना, ऐसा नहीं होगा, और तुम शांत, स्थिर और सामंजस्यपूर्ण मन के साथ जी सकोगे।

आज तक के मनुष्यों में, लगभग सभी लोग चिंता और भय की लहरें, या स्वार्थी इच्छा-विचारों के स्पंदन की लहरें उठाकर, मन में ऊँची लहरों वाला तूफ़ानी दृश्य रच रहे हैं और इस दुनिया को असामंजस्यपूर्ण बना रहे हैं।

वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, क्योंकि वे मनुष्य के सत्य (अपने असली स्वरूप, अपने सच्चे हृदय) को स्पष्ट रूप से पहचानने तक नहीं पहुँचे हैं।

घृणा, दुःख, ईर्ष्या, द्वेष, “बलवान ही जीतता है” जैसे विचार, दूसरों को बाहर रखने वाले विचार, ये सारे असामंजस्यपूर्ण विचार ही मन के समुद्र का तूफ़ानी दृश्य हैं।

इसलिए, अगर तुम मन के समुद्र की सतह की लहरों को शांत रख सको, तो सतही चेतना के भीतर स्थित देवलोक के मन को अपनी चेतना के रूप में जी सकते हो।

तो, मनुष्य को गहरे समुद्र (देवलोक) के मन से जीने के लिए यह जानना चाहिए कि इस दुनिया में प्रकट हुई लहरें (सतह की लहरें) सब की सब ऐसी हैं जो सतह पर प्रकट होते ही मिट जाती हैं, और दिव्य चेतना (गहरे समुद्र का मन) ही असली तुम हो, और शांत, स्थिर मन (सबको जन्म देने और पालने वाले विशाल महासागर के मन) को अपना बना लेना ही सबसे पहला पाठ है। (अगली बार जारी)

 

 

दिव्य मानवता के रूप में जीने का मार्ग

इस ब्लॉग के संदेश, विषय के अनुसार एक पुस्तक-श्रृंखला में फिर से संजोए गए हैं।
यह श्रृंखला एक-एक खंड करके प्रकाशित की जाएगी।

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