दिव्य मानवता के रूप में बुनियाद स्थापित करने के लिए (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★दिव्य मानवता के रूप में भी बुनियाद स्थापित करें
अभी बहुत कुछ बताना है, जनाना है, पर समय न आने से न बताई जा सकने वाली बातें भी हैं।
उसे बताने से नकारात्मक भावनाएँ उठकर चेतना के विकास की यात्रा से छूट जाने का ख़तरा हो, ऐसा कठोर सत्य, भावनात्मक विचारों से जिसे स्वीकार न किया जा सके ऐसा सत्य।
हम उसे तुम लोगों के मानसिक स्पंदन की औसत तरंग-दैर्ध्य के बदलाव को देखते हुए उतार रहे हैं।
हर हाल में समष्टि को लक्ष्य बनाकर।
व्यक्ति को लक्ष्य बनाएँ तो हर एक की चेतना-सीमा इतनी अलग है कि अंत नहीं, इसलिए सबके लिए आसानी से समझ आने वाली बात नहीं बन पाने का झुकाव है, पर यथासंभव देखने वाले सबके लिए लाभदायक बात बने, इसके लिए हमेशा शब्द चुनकर, उपाय करके सत्य बताना जारी रखे हुए हैं।
तुम लोगों में शायद ऐसे लोग हों जिन्हें हमारी बात अस्पष्ट मानसिक सिद्धांत लगती है और जो सहमत नहीं हो पाते।
पर ऐसे लोगों के लिए भी ज़रूर ऐसा समय आएगा जब समझ आएगा कि हम ऐसी बातों पर ज़ोर देकर क्यों बताते हैं।

कल का सिलसिला आज, आज का सिलसिला कल, इस तरह नए दिन पाने वाले लोग बहुत हैं, पर आत्मिकीकरण के चरण में प्रवेश कर चुकी पृथ्वी पर पूरी मानवता रोज़ पुनर्जन्म का अनुभव करके, नई कोशिकाएँ पहनकर, मन की केंचुल छोड़ने का अनुभव जमा कर रही है।
न बदलने वाली केवल स्मृति है, और स्मृति से शासित विचारों को अपना मानने वाला विचार फीका पड़ जाए, तो हर कोई सच्चे अपने, दिव्यता की चेतना को अपने भीतर खोजने लगता है।
किसी भी बात में ऐसा ही है, बुनियाद और मूल महत्वपूर्ण हैं, यह समझते हो न।
क्योंकि उसकी उपेक्षा करके उन्नति, निपुणता, प्रगति या विकास नहीं हो सकता।
रोज़ नया जन्म ले रहे हो, यह मन में अंकित करके, विचार, शब्द और कर्म दिव्यता से निकलने वाली गूँज से मेल खाएँ, ऐसा प्रशिक्षण करते जाओ, तो कोई भी एक दिन बिना प्रयास के प्रतिवर्त की तरह दिव्यता के विचार, वचन और कर्म कर पाने लगता है; इसलिए सतही दुनिया चाहे कैसी भी स्थिति दिखाए, बिना घबराए, बिना शोर किए, चेतना को जीवन के प्रकाश में स्थिर करके, पूरी मानवता की चेतना के विकास की कामना वाली प्रार्थना को मूल बनाकर, अपने को माँजकर ऊँचा उठाने वाली गहरी साँस सचेत रूप से जारी रखो।
क्योंकि सचमुच यही अभी पृथ्वी के आयाम को ऊपर उठाने की प्रेरक शक्ति बन रही है। (समाप्त)






