सच्ची स्वतंत्रता के बारे में (उत्तरार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
(पिछली बार से जारी)
★ऐसा उदाहरण जिससे समझ आए कि कारण अपने में है
तो इस बात को और साफ़, अनुभूति के साथ समझाने वाला कोई ठोस उदाहरण है क्या, यह सोचकर धरती पर नज़र डाली, तो मिल गया।
वह है किसी व्यक्ति के एक नौकरी से दूसरी नौकरी में जाने का कारण।
नौकरी बदलना चाहता हूँ, बदलूँगा, सोचकर क़दम उठाते समय जो निमित्त बनता है, नौकरी बदलने का कारण; अगर वह सत्य के अनुरूप कारण है तो वह बदलाव आसानी से अच्छा चलता है, और अगर नहीं, तो फिर वही दीवार आसानी से सामने आती है।
क्या बात है, तो अगर नौकरी बदलने का कारण नकारात्मक है, तो उसी कारण वाली मिलती-जुलती अप्रिय स्थिति और भाग जाने की चाह वाले विचार प्रकट होते हैं; और अगर कारण सकारात्मक है, तो “यह करना है, वह करना है” विचार जितने ठोस हों उतने वे सिद्ध होते हैं, फिर और ऊँचा लक्ष्य बनता है, उसे फिर पार करते हैं, इस तरह जीवन का प्रमाण पक्के तौर पर छोड़ सकने वाला परिपूर्ण समय बिताया जा सकता है, यही बात है।
नकारात्मक कारण का मतलब है, वह बॉस नापसंद है, या सहकर्मियों से पटती नहीं और कार्यस्थल मज़ेदार नहीं, या साथ के लोग पहले तरक़्क़ी पा गए और शर्मिंदगी हुई, या इस काम से उस काम में वेतन ज़्यादा है, या यह काम मेरे लिए मूल रूप से उपयुक्त नहीं, या अभी के कार्यस्थल का आने-जाने का समय बहुत लंबा है इसलिए घर के पास वाला काम अच्छा है, इस तरह किसी न किसी नकारात्मक पहलू पर रोशनी डालने वाला कारण।
नौकरी बदलने वालों में ज़्यादातर के कारण इसी श्रेणी में आते हैं।
ऐसे में, जब तक यह समझ न आए कि कारण अपने विचारों के इस्तेमाल के ढंग में था, तब तक नौकरी बदलते रहना पड़ता है, और स्थिर सुख का स्वाद पाना कठिन होना भी होता है।
तो उल्टे पैटर्न का सकारात्मक कारण कैसा होता है, तो ○○ पूरा करके देखना चाहता हूँ, या □□ साकार करना चाहता हूँ, जैसे दृढ़ लक्ष्य या उद्देश्य वाले मामले को कहते हैं।
ऐसे में लक्ष्य या उद्देश्य जितना ठोस हो उतना अच्छा, यह कहने की ज़रूरत नहीं।
पृथ्वी के बहुत से लोग सपने और आशाएँ रखते हुए भी उन्हें ठोस नहीं बना पाए, या न सपना न आशा रखकर यों ही जीवन की शक्ति को बेकार छोड़कर सुलगते रहे, इसका कारण यह है कि कुछ नापसंद है इसलिए किसी और चीज़ के पीछे भागने वाले सोच (कल्पना) के पैटर्न के गड्ढे में बिना जाने गिरकर, उस गड्ढे में इधर-उधर भटकते, या चढ़ने की कोशिश में फिसलकर गिरते रहे, यही बात है।
या फिर “नापसंद है पर △△ के लिए है इसलिए कोई चारा नहीं” जैसे अपने मन को बहलाकर, झूठ बोलकर, बहला-फुसलाकर दिन काट रहे हैं।
क्या करने से क्या होता है, ये सिद्धांत साफ़ समझ आ जाएँ, तो कोई भी जीवन-ढंग में ग़लती किए बिना जीवन के स्रोत से उमड़ने वाली सृजनशीलता प्रकट करके और परिपूर्ण दिन बिता पाने लगता है।

★स्वतंत्रता तुम्हारे भीतर है ~ तुम्हारी स्वतंत्रता तुम पर निर्भर है
सच्ची स्वतंत्रता का भी वही सिद्धांत है।
किसी चीज़ से स्वतंत्र होना चाहने वाला चेतना-स्तर का चरण अभी कहे गए सोच (कल्पना) के पैटर्न के गड्ढे में फँसी स्थिति है, या द्वैत के टकराव की गुफा के भीतर निकास भी न जानते हुए भटकने जैसी अवस्था है।
इस तथ्य को “अच्छा, ऐसा था!” कहकर मन से समझ लेने वाला व्यक्ति ही सच्ची स्वतंत्रता पाकर, अपने जीवन को किसी से भी दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे हुए बिना चमकाते रहने वाली अवस्था में जा सकता है।
ठीक है?
अभी चाहे किसी भी अवस्था में हो, वर्तमान स्थिति को कभी नकारना नहीं।
और अपने और दूसरों की तुलना करके ख़ुश-दुखी होना भी बेतुका है।
तुम्हारा जीवन ब्रह्मांड में एकमात्र अस्तित्व है, किसी से भी तुलना की जाने वाली चीज़ नहीं।
तुम्हारा अभी का व्यक्तित्व, स्थिति, वातावरण तुम्हारे पिछले जन्म समेत अतीत के विचार, वचन और कर्म ने बनाया है।
यह तथ्य है, उसी तरह अभी के तुम्हारे विचार, वचन और कर्म ही अभी इस क्षण के बाद के भविष्य के भाग्य को रच रहे हैं, यह भी निस्संदेह तथ्य है; इसलिए हमेशा भविष्य को चमकाते रह सकने वाला चेतना का इस्तेमाल जारी रखो, तो जीवन में अस्वतंत्रता रचकर अपने बनाए अरुचिकर जीवन से संतोष किए बिना, दी गई जीवन-शक्ति को जीवंत करके तेज़ी से आत्म-साक्षात्कार करते जा सकते हो, यही बात है।
हमारी बात शायद अमूर्त लगे, पर यह चीज़ों के मूल सिद्धांत को पकड़कर मूलभूत हिस्से से चेतना की स्थिति बदल देने वाली बात है, इसलिए इसे अपने जीवन में लागू करते समय, इसी भाव से, अपने को जड़ से बदलने के इरादे से जीकर देखो।
क्योंकि बस ऐसा करो, तो जीवन का दृश्य और मंच ज़रूर अतीत से बिल्कुल अलग, चकाचौंध कर देने वाला बनता जाएगा। (समाप्त)






