सच्ची स्वतंत्रता के बारे में (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★तुम्हारे लिए स्वतंत्रता क्या है
यह बात पढ़ने के बाद एक चीज़ करके देखना।
वह है, अपने लिए स्वतंत्रता क्या है, इस पर आँखें बंद करके गहरी साँस लेते हुए विचार करना।
उस समय तुम्हारे दिमाग़ के परदे पर उभरने वाली छवि कैसी होगी?
माता-पिता, भाई-बहन और बाक़ी मानवीय संबंधों से स्वतंत्रता?
स्कूल या कंपनी, या अन्य संगठनों से स्वतंत्रता?
आर्थिक तंगी से स्वतंत्रता?
बीमारी जैसी शारीरिक अक्षमता से स्वतंत्रता?
या किसी चीज़ से स्वतंत्रता नहीं, बल्कि अपने आदर्श के साकार होने की छवि, या जो पूरा करना चाहते हो उसके सिद्ध होने की स्थिति?
जब “मैं” नामक अस्तित्व को शरीर ही मानने वाली चेतना में घुसे हों, तब ○○ से स्वतंत्रता सोचने का झुकाव होता है, है न।
तो जिसे अस्वतंत्रता माना जाता है वह लक्ष्य ज़्यादातर मामलों में भौतिक आयाम की कोई न कोई चीज़ होती है, और उनसे मुक्त हुई स्वतंत्रता, बच निकल पाई स्वतंत्रता की कल्पना करना ज़्यादा होता है।
पर सच कहें, तो जिसे अस्वतंत्रता माना उससे भागकर स्वतंत्र होने की कोशिश के कर्म के आगे के भविष्य में सच्ची स्वतंत्रता नहीं है।

★सच्ची स्वतंत्रता
सच्ची स्वतंत्रता दिव्य चेतना के भीतर है।
तुम लोगों से पहले चेतना का विकास पाकर पहले ही सच्ची स्वतंत्रता का आनंद ले रही ब्रह्मांड की मानवता का उदाहरण लें, तो हर कोई, जीवित होना (जीवित रखा जाना) ही, वह अपने आप में कृतज्ञता, विनय और हर्ष का विषय है, ऐसी मानसिक स्थिति बिल्कुल सामान्य है, और जीवन को जीवंत करके जी पाना आनंददायक, परिपूर्ण, और ज़रा भी शिकायत न होने वाली मनोदशा में है।
पृथ्वी भी असेंशन पूरा कर ले, तो तुम पृथ्वी के लोग भी जल्दी ही सब उस अवस्था में जी पाओगे।
तो चेतना के विकास की ओर बढ़ने वालों में बहुत से लोग उससे एक क़दम पहले की स्वतंत्रता को स्वतंत्रता मानते हैं।
यानी, अपनी धारणाओं से मुक्ति, आसक्तियों से मुक्ति, जिसे “मैं” समझने की भूल की थी उस आत्म-चेतना से मुक्ति ही सच्ची स्वतंत्रता है, यह बिना संदेह मानने वाली अवस्था।
उस चरण से स्नातक हो जाओ, तो किसी चीज़ से किसी चीज़ में जाना सच्ची स्वतंत्रता नहीं थी, बस क्षैतिज हलचल भर थी, यह सहज रूप से समझ आता है, और पवित्र जीवन के प्रकाश को स्वच्छंद रूप से काम में लाकर भाग्य का सृजन इच्छानुसार सिद्ध किया जा सकने लगता है, यही बात है।
उस चरण तक चेतना का विकास हो जाए, तो विचार अब द्वैत के टकराव के आकाश-धरती में नहीं रहते, इसलिए असंतोषजनक स्थिति को संतोषजनक स्थिति में बदलने जैसा सोचना ही बंद हो जाता है।
उस चरण में, ऐसा करना है, वैसा करना है, सोचने वाले सारे विचार दिव्यता के भीतर हैं, इसलिए अपने विचार, वचन और कर्म से किसी से टकराना या किसी को दुखी करना नहीं होता, जो भी करो सब महान सामंजस्य ही है, केवल अच्छी बातें, केवल शानदार बातें खुलने वाला जीवन जिया जा सकता है।
यही सच्ची स्वतंत्रता है।
यह सचमुच समझ आ जाए, तो हर मनुष्य सुख से जी सकता है।
उस मनोदशा में अस्वतंत्रता का एक भी बीज नहीं, इसलिए न अभाव महसूस होता है न शिकायत।
बीज न होने का मतलब क्या है, तो तुम लोगों की अब तक महसूस की गई शिकायतें और अभाव-भाव का कारण बाहरी दुनिया में नहीं था, बल्कि अपने विचारों के वैसा मान लेने से रचे गए भ्रम या मतिभ्रम जैसी चीज़ थी = कारण अपने विचारों के इस्तेमाल के ढंग में था, यह साफ़ याद करके छोड़ पाई हुई चेतना में होना (चेतना के हवाई झूले से छलाँग लगा पाना), यही बात है। (अगली बार जारी)






