सृजन और विकास की प्रक्रिया के बीच (उत्तरार्ध)
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(पिछली बार से जारी)
★बीमारी के बारे में चेतना का उपयोग कैसे करें
तो, विचारों के उपयोग का यह ढंग बीमारी ठीक करने जैसी बातों में भी कारगर है।
ऐसा करो तो ऐसा होगा, इस तरह की सकारात्मक कल्पना लगातार करते रहो, और संदेह या चिंता के विचारों को लगातार मिटाते रहो, तो भविष्य की शारीरिक स्थिति पर भी अच्छा असर दिखने लगता है।
उदाहरण के लिए, अगर तुम्हें मधुमेह जैसी कोई बीमारी है, तो “मैं नकारात्मक चेतना के उपयोग से आगे निकल चुका हूँ, इसलिए बीमारी की जड़ बनने वाले विचार नहीं छोड़ता। अब बस अभी दिख रहे लक्षणों का ठीक होना बाकी है। अब से मैं स्वयं अपने को चंगा करता हूँ। इस हाथ से जीवन का प्रकाश उमड़ रहा है। यह हाथ पेट पर रखूँ, तो मेरे अग्न्याशय के लैंगरहैंस द्वीप के ऊतक में स्थित बीटा कोशिकाओं की नवीनीकरण-शक्ति सक्रिय हो जाती है, जितना ज़रूरी है उतना इंसुलिन बनता है, और रक्त-शर्करा सामान्य बनी रहती है”, ऐसा सोचकर, इलाज जारी रखते हुए, इसे व्यवहार में लाओ।
इसे बिना संदेह के सोच पाओ, तो नकारात्मक विचार-आदतें फीकी पड़ती हैं, शरीर की कोशिकाएँ भी उत्तर देती हैं, और यह शरीर की हालत को अच्छी दिशा में ले जाने में मदद बनता है।
महत्वपूर्ण बात है संदेह न करना।
“मुझे तो कैंसर है, मुझसे यह नहीं होगा”, ऐसा सोचने वाले लोग भी हो सकते हैं, लेकिन संसार में ऐसे लोग भी हैं जो कैंसर होने पर भी डरे बिना, कैंसर के साथ मेल-जोल से रहकर सामान्य जीवन जीते हैं, इसलिए कैंसर को शत्रु न मानकर, भय के विचारों को उजाले के शब्दों से मिटाकर, भविष्य की आशा मन में रखते रहना मन का बड़ा सहारा बनता है, इसलिए आशा रखना कभी मत छोड़ना।
यहाँ कुछ लोग सोच सकते हैं, “तो किसी विशेषज्ञ से हीलिंग करवा लें तो ठीक हो जाएगा”, लेकिन कोई भी बात हो, अगर व्यक्ति स्वयं अपनी सक्रिय इच्छा से न जुटे, तो केवल किसी से कुछ करवा लेने भर से मन की गहराई की विचार-आदतें आसानी से नहीं बदलतीं, इसलिए दूसरों की मदद लेते समय भी अपनी चेतना के उपयोग के ढंग को महत्व देना।
और, चेतना के इस उपयोग के समय ध्यान रखने की बात बता दूँ, किसी भी स्थिति में, डॉक्टर से ठीक से सलाह लेकर, उचित इलाज लेते हुए ही यह करना।
यह पक्की शर्त है, इसलिए ध्यान रखना।
नहीं तो, “हमारे घर वाले ने अजीब बात पर विश्वास कर लिया, इसी से लक्षण बिगड़ गए”, ऐसा पछतावा परिवार को झेलना पड़ सकता है।

★सृजन और विकास की प्रक्रिया के बीच
तो, यह बात हर चीज़ पर लागू होती है, बुरी नियति पिछले जन्म, उससे पिछले जन्म, और उससे भी पहले के जन्मों समेत पुराने विचार, वचन और कर्म के कारण प्रकट होती है, इसलिए अगर भविष्य को अच्छा बनाना चाहते हो, तो इस क्षण के विचार को आशा से भरी, उजली और निश्छल चेतना में रखना अच्छा है।
तो, पहली बात पर लौटता हूँ, सबसे अच्छा यह है कि ऐसा जीवन जियो जिसमें अपने को चमचमाता निखारने, ऊँचा उठाने और गहरा करने वाली बातों में परम आनंद महसूस हो।
क्योंकि बस ऐसे जीते रहो, तो नकारात्मक सोच की आदत वाले विचारों पर नया सेव हो जाता है, और हर बात को सकारात्मक ढंग से लेकर, विपत्ति को सौभाग्य में बदलने वाला जीने का ढंग अपने-आप आ जाता है।
ऐसा बनने के लिए, हृदय की गहराई से यह विश्वास करो और स्वीकार करो कि “जीवन में होने वाली बातों में कोई संयोग नहीं है, सब ज़रूरी और अनिवार्य घटनाएँ हैं, और बेहतर होने की एक अस्थायी प्रक्रिया भर हैं।”
अभी सब ठीक चल रहा लगे, या न लगे, सब कुछ सृजन और विकास की प्रक्रिया है।
इसलिए नियति का विरोध किए बिना उसे स्वीकार करो, पर हार भी मत मानो, और दृढ़ता से सोचो, “आज की चेतना ही भविष्य रचती है, इसलिए इस क्षण को सकारात्मक होकर जियूँ, तो भविष्य निश्चित रूप से और भी शानदार होगा”, और सोच लेने के बाद हल्की-फुल्की चेतना से उजाले वाली सोच को फैलाते जाओ।
क्योंकि ऐसा करते रहो, तो कल और बेहतर होगा, और इसी के दोहराव से और भी शानदार भविष्य खुलता जाएगा। (समाप्त)






