रोज़ की बातें (3)
प्रकाशित अद्यतन
★प्रेम की कमी का कारण
“प्रेम कम है” कहकर दूसरों से बस माँगते रहने वाला व्यक्ति, शायद कोई महत्वपूर्ण बात अनदेखी कर रहा है।
समझे?
हाँ, दूसरों से माँगने से पहले, वह स्वयं अपने से प्रेम नहीं कर रहा।
इसलिए, किसी और से पहले अपने ही मन को गले लगाकर, मन को प्रेम से भर देना अच्छा है।
★अपने को देखने का ढंग
मनुष्य जब अपने मन को ईमानदारी से देखता है, तो उसमें अच्छे-बुरे, सुख-दुख मिले-जुले, तरह-तरह की चेतनाएँ पड़ी दिखती हैं, है न।
उन्हें मोटे तौर पर बाँटकर देखो, तो उन्हें दो मनों में बाँटा जा सकता है, मिट जाने के लिए नियत विचारों की लहरें, और अनंत काल तक चमकती रहने वाली चेतना।
अपने को देखते समय जो यह दृष्टि नहीं अपनाता, उसकी अपने बारे में दृष्टि अच्छे-बुरे की मिली-जुली बन जाती है, और मन की पूरी तस्वीर ठीक से पहचानी नहीं जाती, इसलिए ध्यान रखना होगा।
★धीमी और आरामदायक साँस की सलाह
जिन लोगों की टाँग नकारात्मक विचार-आदतें खींचती रहती हैं, उनमें बहुत से ऐसे हैं जिनकी स्मृति पिछले जन्मों से लाई गई विचार-प्रतिक्रियाओं के ढर्रे के वश में है, और वे होने योग्य जीवन की चमक प्रकट नहीं कर पाते।
ऐसे लोगों के विचार निराशा, पछतावे, आशा और उम्मीद के बीच आते-जाते रहते हैं, और बहुत बेचैन और व्यस्त रहते हैं।
ऐसे लोगों के लिए ही, साँस को धीमा और आरामदायक बनाए रखना अच्छा है।
साँस लंबी हो जाए, तो चेतना बिना जाने स्थिर हो जाती है, और क्या करें कैसे करें सोचने का समय भी नहीं मिलता, और पता ही नहीं चलता कब तुम बदल जाते हो।
इच्छा-शक्ति को सक्रिय किए बिना भी चेतना का विकास संभव है, इस पक्ष से देखो, तो इससे कारगर और आसान तरीका कोई नहीं, इसलिए ऐसा-वैसा सोच-विचार चलाए बिना, अपनी इत्मीनान भरी साँस की आवाज़ पर मन-शरीर को सौंप दो।
तुम ज़रूर बदल सकते हो।

★जीवन के प्रति कृतज्ञता
अगर तुम सच में चेतना का विकास चाहते हो, तो अपने को जीवन देने वाले “जीवन-शक्ति के स्रोत” के प्रति, और भौतिक लोक में तुमसे काम करवाने वाले शरीर (सारी भौतिक कोशिकाओं) के प्रति, हृदय से कृतज्ञता अर्पित करते हुए जियो।
यह मनोवृत्ति हो या न हो, इससे चेतना के विकास (गहराई, दिव्यता) की मात्रा बिल्कुल अलग होती है।
★महान व्यक्ति की शर्त
भौतिक मनुष्य के शरीर का बढ़ना, एक निश्चित लंबाई और वज़न तक पहुँचकर रुक जाता है, लेकिन मन का बढ़ना, कितना भी उत्तम हो जाए, उसका कोई अंत नहीं।
क्योंकि उत्तम हो गया ऐसा लगते ही, और भी गहरी अवस्था दिखने लगे, यही असली है।
इसलिए, अपने को उत्तम हुआ मानते समय अगर “इससे आगे कुछ नहीं, मैं सर्वोच्च अवस्था में पहुँच गया” ऐसा लगे, तो वह पुराने भिक्षुओं द्वारा कहा जाने वाला “माया का क्षेत्र” है, सावधानी वाली मनःस्थिति है, इसलिए दिशा सुधारो।
क्योंकि मनुष्य जितना महान बने उतना विनम्र बने, और लोगों की टोका-टाकी भी ठीक से सुन सके, यही महान व्यक्ति होने की न्यूनतम शर्त है।
★जीवन की व्यवस्था जानकर उजले होकर जियो
“दर्द हो रहा है” सोच सकते हो।
“कष्ट हो रहा है” सोच सकते हो।
लेकिन, हर समय जीवन की पूर्णता पर विश्वास करके जियो।
तुम्हें जीवन देने वाला जीवन का प्रकाश, तुम्हें ऐसी कठिनाई कभी नहीं देता जिसे तुम पार न कर सको।
रहस्य खोलूँ, तो संरक्षक आत्मा नाम की निजी दिव्य सत्ता, 24 घंटे, 365 दिन, बिल्कुल सोए बिना, तुम्हारी नियति को भलाई की ओर ले जा रही है, और उसकी गहराई में, भीतरी दिव्यता का बाहरी काम यानी संरक्षक देवता देखरेख कर रहे हैं, और जब संरक्षक आत्मा अकेले की शक्ति काफ़ी न हो, तब प्रबल जीवन-प्रकाश डालकर साथ देते हैं।
इसलिए, “मैं अकेला जी रहा हूँ” सोचने की ज़रूरत नहीं।
क्योंकि ऐसा मान बैठना ही आसानी से कष्ट पैदा करता है।






