रोज़ की बातें (2)
प्रकाशित अद्यतन
★आत्म-बलिदान से आगे बढ़ना
आत्म-बलिदान में असाधारण आनंद महसूस करने वाली चेतना-अवस्था, पहली नज़र में बहुत महान लग सकती है, लेकिन क्या ऐसा व्यक्ति आयामी उत्थान वाली चेतना से जी रहा है, तो बिल्कुल नहीं।
पृथ्वी के सचमुच महान बन चुके संसार का नेतृत्व करने वाले लोगों की चेतना, बिना एक भी अपवाद के, स्वयं को भी, दूसरों को भी, प्रकृति को भी, जीवों को भी, सबको जीवित रखने वाली चेतना से जीती है।
संसार के लिए, दूसरों के लिए कितना भी सोचो, ख़ुद को दबाना असली नहीं।
आगे के युग में, आत्म-बलिदान वाली जीवन-शैली जी रहे लोगों को भी, अपना ख़याल रखने के महत्व पर कोमलता से ध्यान दिलाया जाएगा।
★दर्पणों से भरे संसार को पार करो तो
अपनी बात एक ओर रखकर केवल दूसरों की आलोचना करने वाला व्यक्ति, जीवन की पवित्रता के प्रति जागने लगे तो क्या होगा, सोचते हो?
अब तक हमारी बहुत बार कही गई “सब अपनी बात है” वाले सत्य तक पहुँचकर, दर्पणों से भरे संसार में सब कुछ अपना प्रक्षेपण था यह बोध होने तक, अहं पर विजय पाने के चरण में प्रवेश करता है।
लेकिन वह भी लंबी दृष्टि से देखें तो थोड़े समय की बात है, और अंततः यह बोध पाकर कि स्वयं ही अपने भाग्य का रचयिता है, स्वयं को भी दूसरों को भी क्षमा करने और प्रेम करने तक पहुँचेगा।
भौतिक शरीर में रहते हुए ही।
★एकत्व का सार
अपने मन की गहराई में ही, एकत्व का सार चमक रहा है।
इसलिए, दूसरों से मेल-जोल रखने से पहले, अपने आप से मेल-जोल रखना होगा न।

★देखने वाला स्व और देखा जाने वाला स्व
देखने वाला स्व और देखा जाने वाला स्व एक हो जाए तो बड़ी बात है।
क्योंकि वह, भौतिक शरीर की धारणा से चिपकी चेतना-अवस्था से, बहुत पहले आगे बढ़ चुकी चेतना है।
★मनुष्य में स्वयं अपने आप को गहराई से देखता है
ब्रह्मांड को रचने वाली चेतना में, बहुत जटिल रूप से ही सही, देखने वाला स्व और देखा जाने वाला स्व होता है।
तेज़ समझ वाले तुम अब तक समझ गए होगे न।
कि मनुष्य की सतही चेतना, देखा जाने वाला स्व है।
★दिव्यता और कर्म की पहचान
मनुष्य की चेतना को दिव्यता और मिटते जाने वाले कर्म में बाँटकर देख सको, तो सबका जीना बहुत आसान हो जाएगा।
ऐसा होने की इच्छा से ही हमेशा कहते हैं, “जिसे तुम ‘मैं’ मानते हो वह ‘मैं’ सच्चा ‘मैं’ नहीं”।
इसका सच्चा अर्थ समझ आने पर, तुम्हारी मनःस्थिति एक-दो चरण गहरी होगी, और तुम जीवन में महसूस होने वाली कठिनाइयों को पीड़ा भी न मानने वाले व्यक्ति बनोगे।
★चेतना को फैलाने के लिए
कहाँ से कहाँ तक अहं वाला स्व है, और कहाँ से कहाँ तक जीवन के सार वाला स्व, अपने मन को ईमानदारी से और वस्तुनिष्ठ रूप से निहारकर, स्पष्ट रूप से अलग पहचान सकने लगो।
इसके लिए जैसा हमेशा कहते हैं, निरंतर श्वास को धीमा और शांत रखकर, इत्मीनान भरे मन से जीना अच्छा है।
यहाँ एक और मुख्य बात है “यु” ध्वनि का कोतोदामा।
जापानी के युत्तारी (धीमा, खुला), यूयू (इत्मीनान भरा), युक्कुरी (धीरे), यूदाई (विशाल), युमे (सपना) जैसे शब्दों की तरह, “यु” ध्वनि में आयामों की गहराई सहित फैलाव का अर्थ देने वाली शक्ति है।
ऐसी मुख्य बातों को मज़बूती से पकड़कर शब्दों का उपयोग करने वाला व्यक्ति, स्वयं को मार्ग दिखाने में निपुण बन सकता है, और ऐसा व्यक्ति ही, सच्चे अर्थ में मानवता का मार्गदर्शक कहा जा सकता है।






