प्राचीन स्मृतियाँ याद करने की सही घड़ी में (पूर्वार्ध)
प्रकाशित अद्यतन
★जीवन के सूर्य में नहाने की आवृत्ति चेतना-स्तर के अनुपात में होती है
मन में चमकते सूर्य को जो जाग्रत मन से हमेशा देख पाता है, उसके बारे में कहा जा सकता है कि वह दिव्य चेतना को जी रहा है।
उसे जीवन का प्रकाश, आत्मिक प्रकाश का सूर्य, जीवन के मूल स्रोत की ऊर्जा आदि, तरह-तरह के नामों से पुकारा जाता है, लेकिन सबका अर्थ है वह मूल शक्ति जो ब्रह्मांड को रचकर, सबको जीवन और अस्तित्व दे रही है।
जिसकी मन की आँख खुल गई, उसे हर व्यक्ति में बसा वह जीवन का प्रकाश दिखता है।
नहीं, इतना ही नहीं, वह सारे जीवों में भी, और प्रकृति-जगत की हर घटना और हर पदार्थ में भी जीवन का प्रकाश देख पाता है।
इसलिए, सारी सृष्टि ब्रह्मांड की सृजन वाली जीवन-ऊर्जा से अस्तित्व में है, यह तथ्य बिना किसी आश्चर्य के समझ आ जाता है, और लगातार कृतज्ञता का भाव अपने-आप उमड़ने लगता है।
इसे दूसरे कोण से कहें, तो “जीवन के सूर्य में नहाने की आवृत्ति चेतना-स्तर के अनुपात में होती है”, यह भी कहा जा सकता है।
इसे उलटकर सोचो, तो समझ आता है कि अभी तुम्हारा चेतना-स्तर लगभग किस स्थिति में स्थायी रूप से रहता है।
उदाहरण के लिए, सूक्ष्म लोक के स्तर वाला व्यक्ति किसी भी बात, किसी भी चीज़ के प्रति कृतज्ञता का भाव नहीं रख पाता।
आत्मिक लोक के निचले से मध्य स्तर वाला व्यक्ति, केवल मन होने पर ही कृतज्ञता का भाव रख पाता है।
मतलब, मूड पर निर्भर।
उससे ऊपर, आत्मिक लोक के मध्य से ऊपरी स्तर में जिसकी चेतना स्थायी रूप से रहती है, उसमें साठ से नब्बे प्रतिशत के अनुपात में कृतज्ञता का भाव उमड़ता है।
और, जिसकी चेतना दिव्य क्षेत्र में स्थायी रूप से रहती है, वह हर बात के प्रति कृतज्ञता का भाव रख पाता है।
इस मानदंड से अपनी स्थायी चेतना को ऊपर से देखो, तो तुम्हारी सतही चेतना अभी किस स्तर पर रहती है, यह एक नज़र में साफ़ समझ आ जाता है।

★स्वतंत्र मन से जियो तो हर मनुष्य दिव्य-मानव है
जिसके मन के आकाश में बादल छाए हैं, वह अपने जीवन के प्रकाश में पूरी तरह नहा नहीं पाता, इसलिए उसकी मानसिक कोशिकाओं और भौतिक कोशिकाओं का नवीनीकरण पिछड़ने की प्रवृत्ति रहती है।
कहा जा सकता है कि यह कर्म या अहं कहे जा सकने वाले, शरीर से चिपके विचारों की तरंगों के कारण, जब विचार भौतिक शरीर या सूक्ष्म देह से कसकर चिपके हों, तब आसानी से होने वाली घटना है।
और, चेतना का स्थायी स्तर आत्मिक लोक के स्तर पर आने लगे, तो “धूप कभी-कभी बादल” जैसी, बिखरे बादलों के कभी-कभी गुज़रने वाली स्थिति होती है, इसलिए मन शरीर से नहीं चिपकता।
लेकिन आग्रहों और पक्की धारणाओं के विचार-बादल अभी बचे रहते हैं, इसलिए जीवन का सूर्य पूरी तरह प्रकट नहीं हो पाता।
इस दृष्टि से देखो, तो समझ आता है न कि मनुष्य के लिए, किसी भी घटना या स्थिति में, चेतना का कल-कल बहते रहना, और एक जगह न ठहरने वाला मन रख पाना ही सर्वोच्च मन है।
पहले भी बताया था, उसे स्वतंत्र मन कहते हैं।
अपने आग्रहों और पक्की धारणाओं वाले कॉन्टैक्ट लेंस को मन की आँख से निकाल दो, तो सब कुछ का “जैसा दिखता है” और “जैसा वास्तव में है” “ज्यों-का-त्यों” दिखने लगता है।
उस समय की चेतना, कुछ भी देखे, कुछ भी सुने, कुछ भी छुए, अच्छा-बुरा या पसंद-नापसंद का फ़ैसला किए बिना सबको ऊपर से देख पाती है, इसलिए चेतना ब्रह्मांड के सृजनकारी मन के असीम रूप से पास होती है।
इसलिए वह सबको स्नेह दे सकती है, क्षमा कर सकती है, प्रेम कर सकती है।
ऐसे मन से जीने वाले व्यक्ति को दिव्य-मानव (शिनजिन) कहते हैं।
मनुष्य मूल रूप से सब दिव्य-मानव हैं।
बस यह भूल गए थे, अभी कैसी भी मनःस्थिति में हो, कैसे भी विचार, वचन और कर्म में हाथ लगाए हुए हो, हर कोई सच में स्वयं ईश्वर ही है। (अगली बार जारी)







